गो-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था

गो-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था

गो-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था
पिछले एक साल में देश में सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला एक सवाल है? जब गौपालक हिन्दू ही गाय को कसाई के हाथ बेच रहा तो गौवध को रोकने के लिए क्या उपाय है? पिछले साल से मन में बेचैनी थी कि क्या गौमाता को बचाने का कोई उपाय नहीं? इस वर्ष सितम्बर के आखिरी सप्ताह में एक व्यक्ति से भेंट हुई और उन्होंने मेरे शहर से कुछ घंटों के रास्ते पर एक दलित गाँव में किये जा रहे काम को देखने का प्रस्ताव दिया। मैं कॉलेज के कुछ युवा और शहर में अन्य लोगों को लेकर नागपुर के बुटीबोरी से पूर्व दिशा में कई किलोमीटर गया तो एक अनोखी चीज देखने को मिली।
वहाँ एक गाँव के 40 परिवारों को एक-एक गाय निःशुल्क दी गई थी और हर परिवार अपनी दूध देने वाली अथवा नहीं देने वाली गाय को बहुत प्यार से पाल रहा है। गाँव की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य है और पूरा गाँव आदिवासियों का ही है। ये सब लोग अपनी गाय का गोमूत्रा जमा करते हैं और एक व्यक्ति के घर रोज सुबह पहुँचा आते हैं। वो प्रति लीटर 2.5 रुपये का हिसाब उनके लिए लिख लेता है। उस व्यक्ति के घर के पीछे एक छोटा-सा कमरा बना था जिसमंे एक छोटी सी डिस्टीलेशन यूनिट लगी थी। हमने देखा कि उसमे गोमूत्रा का अर्क बनाया जाता है जिसे कुछ ओषधि कंपनियाँ 60 रुपए लीटर खरीद लेती हैं।
हमने कई किसान परिवारों से बात भी की। फिर हम एक और बड़ी-सी खुली झोपडी में गए जहाँ सभी गायों का गोबर जमा किया जाता है। कुछ ओषधि और अन्य सामान मिलाकर उस गोबर का शोधन किया जाता है और गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ एक साँचे में भरकर उसका साबुन बनाती हैं। कुछ महिलाएँ साबुन नहीं बनाती क्योंकि उनको अगरबत्ती बनाना सिखाया गया है। ये सब चीजें नागपुर में एक दुकान में बेची जाती हैं। मैंने पूछा कि युवतियाँ साबुन नहीं बनाती? जवाब मिला नहीं, वो सिलाई करती हैं। उनको कपडे खरीदकर दिया जाता है और सिलाई की मशीनंे भी सबको दी गई हैं जिससे वो सब थैली बनाती हैं जो बाजार में बिकता है। गौ-ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था का शानदार उदाहरण है ये छोटा-सा गाँव। मैंने पूछा कि इतना बड़ा काम हो रहा तो इसका प्रचार क्यों नहीं होता? जवाब मिला कि हम प्रचार करेंगे तो काम कौन करेगा। अगर एक गाँव में ऐसा हो सकता है तो अनेक गाँवों में भी हो सकता है। – अभि कुमार शर्मा