गुरु नानक का चिन्तन और संदेश

स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी
प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार


जो सचमुच के महापुरुष होते हैं, जिनके विचार और आचार एक हो जाते हैं। जो भगवान के साथ एकरूप हो जाते हैं, उनका व्यक्तित्व ही उनका संदेश होता है। इसलिए एक दृष्टि से तो गुरु नानक का व्यक्तित्व ही उनका संदेश है और उस पर विशेष कहने की जरूरत नहीं है। उनका जो चरित है, उनकी जो वाणियां हैं, उनका मनन करने से मार्ग मिलता है। लेकिन हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए कुछ इस प्रकार के विश्लेषण की भी आवश्यकता होती है कि किस सम्बंध में, किस संदर्भ में, कौन—सी बात उन्होंने कहीं है और आजकल हमारे लिए उनकी कुछ उपादेयता है या नहीं। आज से पांच सौ पहले के भारतवर्ष की कल्पना कीजिए। देश जात—पांत सम्प्रदाय—अनेक भेदों में विभक्त था, आज भी है और इन सब भेदभावों के अतिरिक्त एक नई शक्ति भी आ गई थी, वह थी इस्लाम की शक्ति। तो जो भेदभाव पहले से काफी जटिल था वह और भी जटिल हो गया था।
मेरी ऐसी धारणा है कि इस्लाम के आने के बाद हिन्दू समाज में एक बड़ी प्रतिक्रिया हुई थी और उसमें भीतर ही भीतर सिमटने की प्रवृत्ति और भी बढ़ती गई। जात—पांत, छुआछुत का भेद जो पहले था, उससे कहीं और अधिक बढ़ता गया। ऐसी स्थिति में गुरु नानक देव का आविर्भाव हुआ था। दो प्रकार की व्यवस्थाएं उनके सामने थीं। एक तो जात—पांत की व्यवस्था, छुआछुत की व्यवस्था, जिसमें अकारण बहुत से लोग हमारे देश मे छोटे माने जाते हैं। कौन छोटा है, यह भी कहना बड़ा मुश्किल है। रिरी साहब ने एक जगह लिखा है कि मैं यह अभी तक स्थिर नहीं कर पाया कि हिन्दुओं में कौन सी जात सबसे छोटी है, क्योंकि हर छोटी जात अपने से अधिक छोटी किसी को बता देती है और अपना दावा करती है कि वह सबसे ऊंची है। कई तरह के भेदभाव हैं, छुआछुत की भी विचित्र व्यवस्थाएं हैं। किसी का शरीर छूने से ही आदमी अपवित्र हो सकता है, किसी का छुआ पानी पीने से अपवित्र हो जाता है। कुछ ऐसे हैं कि जिनका छुआ पानी तो चल सकता है लेकिन पक्की रोटी अपवित्र हो जाती है। कुछ की पक्की रसोई तो चलती है लेकिन कच्ची रसोई, कच्ची का मतलब चावल, वे छू दें तो अपवित्र हो जाता है। यानी कितनी ही तरह के भेदभाव हैं। बाहर के आदमी के लिए तो यह समझने में भी बड़ी कठिनाई होती है कि कैसे यह व्यवस्था चल रही है? लेकिन चल रही है। गुरु नानक देव के समय में भी व्यवस्था चलती थी।
दूसरी चीज थी साम्प्रदायिक व्यवस्था। हमारे देश में अनेक धार्मिक सम्प्रदाय हुए। गुरु नानक देव के पहले ऐसे लोगे भी हो चुके थे जिन्होंने जात—पांत की व्यवस्था पर कस कर आघात किया था, उसे तोडऩे की कोशिश की थी। लेकिन कुछ ऐसा दुर्भाग्य है या यह समझिए कि जाति—पांति की व्यवस्था ऐसी प्रबल सिद्ध हुई कि जो आया घर साफ करने के लिए, आंगन साफ करने के लिए, वही दो ईंट रख गया। उसी के नाम पर एक जात चल पड़ी। उसी के नाम पर एक सम्प्रदाय चल पड़ा और यह व्यवस्था जटिल से जटिलतर ही होती गई। इसके भीतर से रास्ता निकालने का काम बड़े महापुरुष का था और गुरु नानक देव ने वह मार्ग प्रशस्त किया। कहने को औरों ने भी किया। गुरु नानक देव ने भी कहा कि एक ज्योति से सब जग उपज्या – सभी एक ज्योति से उत्पन्न हुए हैं। कौन बड़ा और कौन मंदा? इसमें छोटा कौन और बड़ा कौन? सब परमात्मा के है। सबने मान लिया कि हां, सब परमात्मा की संतान है। फिर भी बात आगे नहीं बढ़ती। एक विशेष प्रकार की बात जो भारतवर्ष में दिखाई देती है, वह यह है कि बहुत से लोग धार्मिक दृष्टि से यह मानते हैं कि सब भगवान के बंदे हैं। सब परमात्मा की संतान हैं। हरि को भजे सेा हरि का होई यह सिद्धांत भी मध्यकाल में भक्ति का जो आंदोलन चला, उसमें यह सिद्धांत मान लिया गया कि परमात्मा को भजने वाला जो है, वह परमात्मा का ही हो जाता है, हरिजन हो जाता है। (चलते—चलते हरिजन शब्द की भी दुर्गति हो गई)। मानते हैं कि अद्धैत है, एक है, नेह नानास्ति किंचन कोई पृथक नहीं है, कोई अलगाव विलगाव नहीं है। लेकिन व्यवहार का सत्य कुछ और है, परमार्थ का सत्य कुछ और है। इस तरह की एक धारणा हमारे देश में है कि परमार्थत: तो यही सत्य है कि सब एक हैं, लेकिन व्यवहार में भेद करना पड़ता है, कोई छोटा है, कोई बड़ा है, कोई ऊंचा है, कोई नीचा है, कोई छूत है, कोई अछूत है।
कोई दसवीं शताब्दी से हमारे देश में मध्यकाल शुरू हुआ, पर कुछ लोग चौथी-पांचवीं शताब्दी से मानते हैं। मैं ऐसा समझता हूं कि यह हमारे देश के प्रति अन्याय है क्योंकि चौथी—पांचवीं शताब्दी में हमारे देश में बड़ी समृद्धि थी। गुप्तों का साम्राज्य था और हर विषय में — कला में, शिल्प में, साहित्य में बड़ी उन्नति हुई। वस्तुत: मध्यकाल कहने का अर्थ केवल काल या समय नहीं है। टाइम का अर्थ नहीं होता। यदि हम किसी को मिडीवल कहते हैं, तो यह मतलब नहीं होता है वह किसी एक खास पीरियड में पैदा हुआ हो। यह एक तरह की मनोवृत्ति है, जिसको हम कहते है — मध्ययुगीन मनोवृत्ति। वह एक जकडी हुई-सी स्टैग्नैंट मनोवृत्ति है। ऐसा मानना कि जो कुछ अभीष्ट था, पहले बड़े बड़े लोगों ने कर लिया, अब हम तो घोर कलियुग में आ गए है, हम क्या कर सकते हैं, सतयुग तो बीत गया, त्रेतायुग बीत गया, अच्छे लोग बीत गए और यहां पर साधारण आदमी रह गए हैं। ज्यादा से ज्यादा हम लोग यह कर सकते हैं कि पुराने लोग जो पोथियां लिख गए हैं, उनका अर्थ लगाएं। तो दसवीं शताब्दी के बाद, बल्कि आठवीं शताब्दी के बाद ही, हमारे देश में टीका युग चलने लगा। यानी कोई मौलिक चिंतन, नए सिरे से सोचना सम्भव नहीं, बल्कि पुराने ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका हम भाष्य कर सकते है, टीका कर सकते है। टीका की टीका, उसकी भी टीका, सात—सात पुश्तों तक टीकाएं चलती रहीं। टीकाओं का युग आ गया। ज्ञान की धारा रुद्ध हो गई।
यह टीका वाली प्रवृत्ति, गुरु नानक का जिस समय आविर्भाव हुआ था, उस समय अपनी चरम अवस्था पर आई हुई थी। नतीजा यह हुआ था कि हिन्दू शास्त्रों के विपुल भंडार में से केवल तीन ग्रंथ चुन लिए गए। हिन्दू शास्त्र बड़ा विपुल है। जिस विषय पर देखिए हजारों लाखों ग्रंथ लिखे गए थे। अब भी जबकि बहुत—सी नष्ट हो गया, तब भी संस्कृत ग्रंथों की खोज करने वालों ने लाखों की संख्या में पुस्तकें पाई है। ये पुस्तकें केवल इस देश में ही नहीं, बाहर भी मिलती हैं, सीलोन में मिल जाती है, बर्मा में मिल जाती हैं, स्याम में मिल जाती हैं। उनमें से तीन ग्रंथों को चुन लिया गया। इनको प्रस्थानत्रयी कहते थे—तीन ग्रंथ या ग्रंथ समूह। इनमें एक है उपनिषद् अथवा दस या ग्यारह उपनिषद् जिन पर आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा था अद्धैत मत के प्रतिपादन के लिए। उपनिषद् कहने से यह दस या ग्यारह उपनिषद् समझे जाते हैं। और भी बहुत से उपनिषद् है बाद के भी लिखे हुए उपनिषद् हैं। लेकिन ये दस—ग्यारह प्रामाणिक उपनिषद् हैं। दूसरी श्रीमद्भगवदगीता और तीसरा वेदांत सूत्र, बादरायण व्यास का लिखा हुआ वेदांत सूत्र। इन तीन ग्रंथों को प्रस्थानत्रयी कहते थे। अगर किसी को कोई नई बात कहनी हो तो पहला काम यह होगा कि प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखकर, टीका लिखकर इस मत का समर्थन करे कि वह जो कह रहा है, वह पुराने शास्त्र के अनुकूल है और अगर ऐसा नहीं करता तो वह अपांक्तेय है, उसको नहीं ग्रहण किया जाएगा।
नाभादासजी ने भक्तमाल नाम का एक ग्रंथ लिखा। बड़ा मशहूर ग्रंथ है। उसमें भक्तों की चर्चा की है। कबीरजी का भी नाम है, रामानंद का नाम है और बहुत से भक्तों का नाम है। गुरु नानक देव का नाम नहीं है उसमें। इसलिए नहीं कि नाभादासजी को गुरु के प्रति भक्ति नहीं थी, लेकिन अपने गुरु के सम्प्रदाय से उनको यह कहा गया था कि उन्हीं भक्तों का जीवन चरित्र लिखना जो किसी न किसी सम्प्रदाय से सम्बद्ध हों। सम्प्रदाय आजकल हिन्दी में जरा खराब अर्थों में प्रयोग होने लगा है। पर इस बात का असली मतलब है कि एक गुरु परम्परा की प्राप्त चीजें, दान रूप में, हेरिटेज के रूप में, हमको जो एक गुरु से दूसरे, दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे में मिला, वह सम्प्रदाय है। तो सम्प्रदाय वह होगा जिसके पास अपना एक भाष्य होगा। अपनी एक टीका जरूर होनी चाहिए और टीका के लिए टीका (तिलक) भी लगाने की जरूरत है। वह इसका सूचक है कि इसके पास एक टीका है। उसका अपना मंत्र होना चाहिए, उसका अपना इष्टदेव होना चाहिए। यह सब कहते कि वृंदावन में एक शास्त्रार्थ सभा हुई। चैतन्य देव बड़े भारी भक्त थे बंगाल के और उनके शिष्यों ने बड़ा साहित्यिक कार्य भी किया है। भक्ति पर जितना अच्छा ग्रंथ उन्होंने लिखा है उतना भारतवर्ष में कम लोगों ने लिखा तो वृदांवन की एक सभा में उनसे पूछा गया कि तुम्हारा कोई सम्प्रदाय है। उन्होंने कहा कि है, तो कहने लगे: टीका कहाँ है तुम्हारे पास, किस ग्रंथ पर तुमने टीका लिखी है, कोई टीका नहीं है इसलिए तुम अलग हो जाओ। तो बलदेव विद्या भूषण ने एक दिन की मोहलत मांगी और रातोंरात वेदांत सूत्र पर टीका लिखकर किसी तरह अपने को जात में दाखिल किया। आप समझ लीजिए कितनी कठोर व्यवस्था थी। कबीर बड़े अक्खड़ थे। उनमें दोनों गुण थे, अक्खड़ भी थे और फक्कड़ भी। लेकिन नाभादास ने उनको जोड़ लिया क्योंकि रामानंद के शिष्य थे। रामानंद रामानुज सम्प्रदाय के थे इसलिए उनको तो मान लिया क्योंकि उनके पास भाष्य और टीका है। लेकिन दादू दयाल को नहीं लिया, गुरु नानक को नहीं लिया, क्योंकि वे अपने को किसी से जोडऩा नहीं चाहते थे।
अब आप सोचिए इस जटिल व्यवस्था में उस व्यक्ति की बात जिसने स्वीकार किया कि जो सत्य है, उसके लिए किसी पोथी के प्रमाण की जरूरत नहीं है। जो सत्य है उसको हम सत्य मानते हैं। तुम्हारी पोथियों में लिखा हो या न लिखा हो। गुरु नानक देव चाहते तो, उनके बड़े—बड़े विद्वान शिष्य थे, एकाध भाष्य, एकाध टीका लिखवा लेना कोई ऐसी बडी बात नहीं थी और संस्कृत भाषा की ऐसी महिमा है कि जैसा चाहो वैसा अर्थ निकाल लो, कर सकते थे। अब भी हम कभी—कभी देखते हैं कि कुछ सिख संस्कृत में कुछ लिखने की कोशिश करते हैं। एक प्रवृत्ति बनी हुई है कि संस्कृत में जब तक एक टीका या भाष्य न हो तब तक आदमी पंक्ति में बैठने लायक नहीं होता। मगर गुरु नानक और उनके शिष्यों ने इस बंधन को बिल्कुल अस्वीकार कर दिया। किसी ने प्रस्थानत्रयी की परवाह नहीं की। यह एक बहुत बड़ा विद्रोह था और बहुत बड़ी दृढ़ता का परिचायक था। धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने कहा कि जात—पांत सब व्यर्थ हैं, भेदभाव सब व्यर्थ है। सत्य का जो मार्ग है, उसे सबको ग्रहण करना चाहिए। चाहे पोथी में लिखा हो या न लिखा हो। सत्य, सत्य है। उन्होंने कहा कि भगवान का रूप ही सत्य है। सत्य रूप है। ऐसी बात नहीं कि उनसे पहले लोगों ने यह बात नहीं की थी। बहुत दिनों से यह बात चली आ रही है। गुरु नानक ने भी इस बात को कहा और बड़े जोर से और बड़ी सीधी भाषा में कहा।

आकाशवाणी के राजेन्द्र प्रसाद व्याख्यान माला में वर्ष 1969 में दिए गए प्रथम व्याख्यान का एक अंश