गांधी नेहरू और संस्कृत

गांधी नेहरू और संस्कृत

देवेंद्र स्वरूप
संस्कृत का अध्ययन करना प्रत्येक भारतीय विद्यार्थी का कत्र्तव्य है। हिन्दुओं का तो है ही, मुसलमानों का भी है क्योंकि आखिर उनके पूर्वज राम और कृष्ण ही थे और अपने इन पूर्वजों को जानने के लिए के लिए उन्हें संस्कृत सीखनी चाहिए।’
यदि मैं आपसे पूछूं कि यह कथन किसका हो सकता है तो आज के वातावरण में आपका सहज उत्तर होगा कि विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंहल के अलावा और कौन नेता ऐसी बात कह सकता है। किन्तु यदि मैं आपको बताऊं कि यह कथन अशोक सिंहल का नही, महात्मा गांधी का है, तो आप अवश्य ही चौंक पड़ेंगे। जी हां, ये उद्गार गांधीजी के मुख से ही निकले थे, 20 मार्च 1927 को जब वे हरिद्वार में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद में भाषण दे रहे थे। उन्होंने अपने पत्र ‘नवजीवन’ ( 23 मार्च 1927 ) में इन्हें प्रकाशित किया था और भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘सम्पूर्ण गांधी वांग्मय’ के खण्ड 33 में पृष्ठ 185 ( हिन्दी) और पृष्ठ 170 (अंग्रेजी) में उपलब्ध हैं। और एक उद्धरण यह भी।
‘मुझे अपनी विरासत और अपने पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होंने भारत को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक ऊंचाई प्रदान की। आप इस अतीत के बारे में कैसा अनुभव करते हो? क्या आपको लगता है कि आप भी इस विरासत में सहभागी और उसके उत्तराधिकारी हैं। और, इसलिए ऐसी किसी वस्तु पर आपको गर्व है जो जितनी मेरी है उतनी ही आपकी भी है? या आप इसके लिए अपने को पराया समझते हो और अजनबी जैसे उसकी बगल से गुजर जाते हो? क्या उसे देखकर आप अपने मन में वह अजीब-सी गुदगुदी महसूस नहीं करते जो इस अहसास में से पैदा होती है कि हम एक विशाल खजाने के उत्तराधिकारी और संरक्षक हैं? …आप मुस्लिम हो और मैं हिन्दू हूँ। हमारे मजहब अलग-अलग हो सकते हैं, किन्तु इस कारण हम उस सांस्कृतिक विरासत से वंचित नही हो जाते जो आपकी भी है और मेरी भी है। यह अतीत हमें बांधकर रखे हुए हैं, तब वर्तमान या भविष्य हमारे बीच दरार पैदा क्यों करें?
आप कहेंगे कि यह कथन तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी नेता का ही हो सकता है क्योंकि वही लोग भारत के मुसलमानों पर उस अतीत को लादना चाहते है जिसे ‘हिन्दू संस्कृति’ कहा जाता है। पर शायद आपको धक्का लगेगा यह जानकर कि ये शब्द गोलवलवर के नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के हैं जो उन्होंने 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अपने दीक्षान्त भाषण मे कहे थे। ( नेहरू, स्पीचेज खण्ड-1,पृष्ठ 335-336)
गांधी और नेहरू भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में दो विचार-प्रवाहों का प्रतिनिधित्व करते है। गांधी जी ने पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता का लगभग पूरी तरह अस्वीकार कर दिया था तो नेहरू जी ने उसे पूरी तरह शिरोधार्य किया था। किन्तु इस बिन्दु पर दोनो एकमत थे कि मजहब बदलने से पूर्वज नहीं बदल जाते और इसलिए उपासना-भिन्नता के बावजूद भारतीय समाज को उसके गौरवशाली संास्कृतिक अतीत के प्रति श्रद्धाभाव ही एकता के सूत्र में पिरो सकता है। दोनों महापुरूषों का यह विश्वास भी कि उस गौरवशाली अतीत में प्रवेश करने की कुंजी संस्कृत भाषा के पास ही है। इसलिए गांधीजी और नेहरूजी दोनों ने संस्कृत भाषा के अध्ययन पर बहुत बल दिया। क्या आज के नकली ‘सेकुलर’ मुसलमानों के सामने गांधी और नेहरू की यह भाषा बोलने का साहस दिखा सकते हैं?
97i/17/huty/6908/15गांधीजी के लिए राजनीति का लक्ष्य सत्ता पाना नहीं था, बल्कि एक नैतिक समाज का निर्माण था। नैतिकता को ही वे धर्म कहते थे। उनका कहना था कि धर्म के ऊपर सब कुछ निर्भर है और संस्कृत जाने बिना धर्मशास्त्रों का ठीक ज्ञान मिलना अशक्य है। इसलिए संस्कृत का जानना प्रत्येक हिन्दू लड़के का कर्तव्य है।’ (सम्पूर्ण वांग्मय, खण्ड 13पृ. 360) अपने बाल्यकाल में गांधीजी की संस्कृत की ओर रूचि नहीं थी, किन्तु एक अध्यापक कृष्णशंकर के समझाने-बुझाने पर उन्होंने संस्कृत की कक्षा में बैठना शुरू किया। गांधीजी अपने सभी परिचितों और सहयोगियों से संस्कृत सीखने का आग्रह करते थे अपने बड़े पुत्र हरिलाल को उन्होंने अंग्रेजी और फें्रच भाषाओं का मोह छोड़कर संस्कृत सीखने का आग्रह करते हुए लिखा ‘संस्कृत ज्ञान से सब भारतीय भाषाओं को जानने का द्वार खुल जाता है। उसको तुमने अपने हाथ से बंद कर दिया। तुमने फिर से फ्रेंच की चर्चा छेड़ी है, इसलिए इतना लिख रहा हुँ। अगर तुम अब भी सोच-विचार छोड़ दो और संस्कृत पढ़ो और उसके निजी अभ्यास के लिए सात के बदले आठ रूपये भी खर्च करो तो मुझे प्रसन्नता होगी।’
कांग्रेस में गांधीजी के लगभग सभी वरिष्ठ सहयोगी एवं अनुयायी – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आचार्य विनोबा, कन्हैयालाल माणिकलाल, मुंशी, महादेव देसाई आदि संस्कृत प्रेमी थे। 1932 में जब गांधीजी यरवदा जेल में सरदार पटेल के साथ बन्द थे और महादेव देसाई को भी उनके साथ रख दिया गया था तब उन्होंने सरदार पटेल को संस्कृत सीखने के लिए प्रेरित ही नही किया, बल्कि पूरा सहयोग दिया। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी किसी दूसरी जेल में बन्द थे। उन्होंने संस्कृत का अध्ययन प्रारम्भ किया और यह सूचना सरदार पटेल व गांधी जी को पत्र में लिखी। राजाजी का पत्र पढ़कर पटेल ने भी संस्कृत सीखने का निश्चय किया और वे उसमें पूरी तरह रम गये। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की ‘संस्कृत शिक्षक’ के 24 खण्ड जेल में मंगाये गये और सरदार ने उनकी सहायता से गांधीजी के मार्गदर्शन में संस्कृत सीखना प्रारम्भ किया। उन दिनों गांधीजी जेल से जिसको भी पत्र लिखते, उसमें सरदार पटेल के संस्कृत अध्ययन की चर्चा बालोचित प्रसन्नता से करते, सभी को सरदार का अनुसरण कर संस्कृत का अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते। 17 जुलाई, 1932 को देवदास गांधी को एक पत्र में गांधी ने लिखा, ‘बल्लभ भाई ने गांडीव चरखे पर कताई और संस्कृत का अध्ययन शुरू कर दिया है। जब उन्होंने सुना कि राजाजी संस्कृत पढ़ रहे हैं तो वह भी उत्साहित हो उठे। वह पूरे मन से उसका अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने सातवलेकर की कुंजी के 24 भाग मंगाये थे। इसमें से पहला भाग वे ( छह दिन में ) समाप्त कर चुके हैं। अब वह दूसरा भाग पढ़ रहे है। उनका अध्ययन बहुत तेजी से चल रहा है। सातवलेकर की पुस्तकें कुल मिलाकर अच्छी है। इन्हें याद करना आसान है। शायद तुमने भी देखा और पढा़ हो।’ (सम्पूर्ण वाड्मय, खंड 50, पृ. 253)
संस्कृत अभ्यास में सरदार पटेल के उत्साह का वर्णन करते हुए, 14 अगस्त 1932 को नाराणदास गांधी को लिखा, ‘वे फिलहाल संस्कृत के अध्ययन में लवलीन हो गये हैं। चलने-फिरने में उसी का पठन-मनन करते हैं। लगभग पांच घ्ंाटे देते हैं। नौजवान विद्यार्थी भी उनके उत्साह के आगे लजा गये। उन्होंने पंडित सातवलेकर के पांच भाग पढ़ लिये हैं। इसके अतिरिक्त वे अब रोज ‘गीता’ के पांच श्लोक भी याद करते हैं।’ जेल में संस्कृत सीखने वाले इतने अधिक लोग हो गये कि गांधीजी ने पं. सातवलेकर को अपनी संस्कृत शिक्षा का एक सेट और भेजने के लिए पत्र लिखा।
संस्कृत भाषा और संस्कृत वांग्मय के प्रति गांधीजी की श्रद्धा उस समय के पूरे कांग्रेस संगठन में संक्रमित हुई थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद पं. नेहरू ने भी जब अवसर मिला तब संस्कृत के माहात्म्य का वर्णन किया। एक अप्रैल, 1956 को पुणे की भंडारकर ओरियन्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट में भाषण करते हुए उन्होंने कहा था, ‘कभी-कभी मैं आश्चर्य करता हूं कि जिन अनेक चीजों ने भारत के हजारों वर्ष लम्बे इतिहास में उसका गौरव बढ़ाया है उनमें सबसे महत्वपूर्ण वस्तु क्या हो सकती है। मुझे अपने मन में तनिक शंका नहीं है कि वह वस्तु संस्कृत भाषा ही है। मेरे विचार से इस भाषा में ही हमारी जाति की बुद्धिमत्ता और वह प्रत्येक चीज जो आगे चलकर हमारे जीवन में प्रगट हुई, उसका स्रोत इस अद्भुत भाषा में ही विद्यमान है।’ (भारत सरकार द्वारा प्रकाशित स्पीचेज खण्ड 3 पृ. 419 )
इसके पूर्व 6 अक्टूबर, 1955 को बंगलौर में एक भाषण में उन्होंने कहा, ‘यह सच है कि हमारी सभी भाषाएं किसी न किसी रूप में संस्कृत से जुड़ी हुई हैं। उत्तर की भाषाएं उसकी पुत्रियां हैं तो दक्षिण की भाषाओं का स्वतंत्र उद््भव होते हुए भी वे संस्कृत शब्दों से भरी हुई हैं। सचमुच ही आगे चलकर दक्षिण भारत उत्तर की अपेक्षा संस्कृत का अधिक बड़ा घर बन गया। हमारे पूर्वज बड़े साहसी थे। उन्होंने पूरे भारत के लिए संस्कृत जैसी शानदार भाषा का विकास किया।'( वही,पृ. 27 ) वर्तमान भारत के लिए संस्कृत के महत्व को बताते हुए नेहरूजी ने 4 सितम्बर 1959 को लोकसभा में कहा था, ‘मैं संस्कृत का भारी प्रशंसक हूं। यदि कोई वस्तु जिसमें भारत के प्राचीन ज्ञान और संस्कृति की महानता समायी हुए है तो वह संस्कृत भाषा ही हैं। …मेरा यह कहना नहीं है कि संस्कृत में सब कुछ अच्छा ही है किन्तु यह मानना पड़ेगा कि संस्कृत ही वह जड़ है जिसमें से भारत का विकास हुआ है। यदि हम इस जड़ से कट गये, जो हमारे लिए बहुत बुरा होगा, हम केवल सतही इंसान रह जाएंगे।’ ( वही, खण्ड-4, पृ.61 ) अपने जीवन के अन्तिम काल में 22 जुलाई 1963 को हैदराबाद स्थित केन्द्रीय अंग्रेजी संस्थान में भाषण करते हुए नेहरू जी ने पुन: इन्हीं भावों को दोहराया। उन्होंने कहा, ‘संस्कृत आश्चर्यजनक भाषा है, वह बहुत भव्य भाषा है। समूचे भारत का, विकास संस्कृत भाषा के माध्यम से ही हुआ है।’ (वही, खण्ड 6, पृ. 39) इसके पूर्व 24 अप्रैल 1963 को लोकसभा में भाषा सम्बन्धी बहस में हस्तक्षेप करते हुए नेहरूजी ने कहा था, ‘इस बात को विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि मोटे तौर पर संस्कृत ही भारत के सम्पूर्ण ज्ञान, संस्कृति और परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करती है।’
संस्कृत का यह स्तुति-गान केवल शब्दों तक ही सीमित नहीं था। नेहरूजी के प्रधानमंत्री काल में संस्कृत को पाठ्यक्रम का अंग बनाने की दिशा में भी गंभीर प्रयास हुए। 23 सितम्बर 1952 को मद्रास विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. लक्ष्मी स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा के लिए एक आयोग ने माध्यमिक स्तर तक संस्कृत पढ़ाने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये–
अ. संस्कृत अधिकांश भारतीय भाषाओं की जननी है। अत: इसका ज्ञान आवश्यक है।
आ. सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों की दृष्टि से संस्कृत ने सदैव लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है, अत: इसकी अवहेलना बुद्धिमानी नहीं होगी।
इ. संस्कृत का अध्ययन करके ही भारत के महान ग्रंथों में भरे हुए ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। अत: इसके अध्ययन को प्रोत्साहन दिया ही जाना चाहिए।
एक अक्टूबर 1956 को केन्द्रीय सरकार ने बंगाल के प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया, जिसे संस्कृत भाषा और उसके शिक्षण की वर्तमान स्थिति व संस्कृत के उन्नयन के उपाय सुझाने का दायित्व सौंपा गया। भारत सरकार द्वारा 1958 में प्रकाशित संस्कृत आयोग की साढ़े चार सौ पृष्ठों की महत्वपूर्ण रिपोर्ट आज के राजनीतिक वातावरण में बहुत पठनीय है। माध्यमिक विद्यालयों में संस्कृत के शिक्षण पर आग्रह करके आयोग ने भारत सरकार को सुझाव दिया कि स्कूलों और कॉलेजों की सामान्य शिक्षा योजना में संस्कृत के अध्ययन की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए, अन्यथा संस्कृत की शिक्षा का आधुनिक काल में जो ‘उदारीकरण’ हुआ है उसे भारी धक्का लगेगा। (संस्कृत आयोग रिपोर्ट खण्ड तीन, पृ. 49)
किन्तु, धीरे-धीरे स्वाधीन भारत की वोट राजनीति ने भारतीय समाज को भाषा, क्षेत्र, जाति व मजहब के आधार पर विभाजित कर दिया और प्रत्येक विषय को वोट-गाणित के चश्मे से देखा जाने लगा। आज हम राष्ट्रीय एकता की बातें तो करते हैं किन्तु हमारी समूची राजनीति संकीर्ण-विभाजनकारी निष्ठाओं के चारों ओर घूम रही है। अपने -अपने वोट बैंक पुख्ता करने की होड़ में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आपाधापी मची हुई है। राष्ट्र दृष्टि से ओझल हो गया है, केवल वोट बैंक शेष रह गये है। इस विभाजनकारी राजनीति का दुष्परिणाम है कि राष्ट्रीय एकता के उन समस्त सूत्रों पर जिन्हें विकसित करने में भारतीय मनीषा को सहस्त्राब्दियां लगी थीं निर्ममतापूर्वक प्रहार किया जा रहा है।
इस राजनीति प्रधान वातावरण में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ वर्ष पूर्व ही अपने एक निर्णय में संस्कृत भाषा के महत्व और उसके अध्ययन की अनिवार्यता पर बल देकर हमारी आंखें खोलने की कोशिश की। किन्तु सत्ता-राजनीति हम पर इतनी बुरी तरह हावी हो गयी है कि हम स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणाओं से कट ही गये हैं, सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थाओंका सम्मान करना भी भूल गये हैं।