गर्भावस्था में ही पड़े थे अभिनय के संस्कार

सदी के महानायक और अभिनय क्षेत्र के बेताज बादशाह अमिताभ बच्च्न का नाम तो बच्चा बच्चा जनता है, परंतु संभवतः बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि अमिताभ में अभिनय के ये संस्कार कैसे आए। इस विषय पर उनके पिता हरिवंश राय बच्च्न ने अपनी आत्मकथा में यत्र-तत्र थोड़ा बहुत लिखा है। उनकी आत्म कथा से ही दो उदाहरण यहां प्रस्तुत किया जा रहे हैं।


गर्भावस्था के दौरान मैंने अपने मैकबेथ के अनुवाद में उनकी (तेजी बच्चन की) रुचि जगाने का प्रयत्न किया। जब उनकी तबीयत कुछ ठीक रहती, मैं उनको अपना अनुवाद सुनाता। नाटकों में उनकी दिलचस्पी थी। मेरा अनुवाद उन्हें बहुत पसन्द आया। कभी-कभी हम नाट्य-पाठ करते, यानी पुरुष पात्र के डायलॉग मैं बोलता, स्त्री पात्र के वे। टाइप-कॉपी से उन्हें पढ़ने में दिक्कत नहीं होती थी। तभी हमने अनुभव किया कि हिन्दी रुपान्तर मंच पर भी लाने योग्य है। तेजी ने एक दिन कहा नाटक का मंचन होगा तो मैं लेडी मैकबेथ का पार्ट करुंगी, मैंने हंसी-हंसी में कह दिया मैं मैकबेथ का । फिर तो हमने सम्भावित मंचन की तैयारी की तैयार में काफी रिहर्सल किये। यह हमारा पुराना शगल था मुझे याद है 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय जब इमर्जेंसी लगा दी गयी थी और युनिवर्सिटी दो तीन महीने के लिए बन्द करा दी गयी थी तो हम दोनों घर पर शेक्सपियर के नाटकों की प्ले रीडिंग किया करते थे। अमित पेट में था। अब हमसे लोग पूछते हैं कि अमिताभ में अभिनय की प्रतिभा कहां से आयी। मैं उन दिनों की याद कर एक प्रतिप्रश्न उछाल देता हूं अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदने की क्रिया कहां से सीखी।

देश को तो हम उससे नही बचा सकते थे, पर घर को बचाना था। क्योंकि य​हां गर्भ की केाठरी में बैठा भविष्य के जीवन का एक नन्हा सा रूप अपने संस्कार ग्रहण कर रहा था। मैंने किसी के सुझाने सिखाने से नही अपने अनुभव से जाना था कि जब सारी आस्थाएं डिंग जाऐं, सुख सन्तोष के सारे साधन लुप्त हो जाऐं, मनोरंजन मन बदलाव का एक भी उपकरण शेष न रह जाए तो कला के शरण में जाना चाहिए, सर्व धर्मान परित्जय मामेक शरण व्रज—वह निराश नहि करेगी। मै तेजी को अपनी कविताएं सुनाता,दुसरो की , हिन्दी की , उर्द की, अंग्रेजी की, संस्कृत की भी जो  मैने स्वमं समझ रखी थी। उनके अर्थ समझाता, उनका सैादर्य दिखाता। हमने उन्ही दिनों बहुत से नाटक भी किए। तेजी किसी पात्र की ओर से बोलती और मैं किसी दूसरे की ओर से। और जब हम थक जाते तो मौन एक दूसरे की ओर देखना भी सुखद होता। हम शायद एक दूसरे को देखकर उसके स्वरूप् की कल्पना करते हो आने वाला था या आने वाली थी। तेजी आने वाले की कल्पना लड़की के रूप में करती मैं लड़के के रूप में। अपनी बौद्धिक उदारता से मैंने लड़के लड़की का अन्तर मन से निकाल दिया था, पर संस्कार भीतर से यही बोलते थे कि लड़का हो तो ज्यादा खुशी हो।

कभी-कभी मैं ऐसा सोचता हूं कि नवदम्पति की पहली संतान लड़की हो तो ज्यादा अच्छा। सन्तान नवदम्पति को सामाजिक स्तर पर बांधती हैं। एक को दूसरे से जोड़ती है, इसमें तो कोई सन्देह नहीं। मेरा ऐसा ध्यान है, लड़की उन्हें अधिक सुकुमार कोमल तन्तुओं से बांधती है। इन बातों में कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। बहुत कुछ बंधने वालों के गुण स्वाभाव पर निर्भर करेगा। नर नारी सम्बन्ध बडा रहस्यमय है। कभी लौह श्रृंखलाओं के बन्धन फूल मालाओं के से लगते हैं कभी फूल मालाओं के बन्धन लौह श्रृंखला के से। कभी कमलनाल तन्तु के बन्धन के बन्धन तोडे नहीं टूटते और कभी मजबूत जंजीरों हवा के हल्के झोंके से खण्ड-खण्ड हो जाती हैं।