गणित में गिनने के अलावा भी बहुत कुछ सिखाया भारत ने

गणित में गिनने के अलावा भी बहुत कुछ सिखाया भारत ने

संपूर्ण विश्व में भारतीय विज्ञान सबसे अधिक प्राचीन और प्रामाणिक माना गया है। प्राचीन भारत में विज्ञान की दो प्रमुख धारायें सबसे प्राचीन मानी गई है। एक है गणित और खगोल विज्ञान तथा दूसरी है औषधि विज्ञान जो आयुर्वेद के नाम से विख्यात है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने भारत में विज्ञान विषय पर दिये गए वक्तव्य में कहा था कि ”विश्व गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में सदैव भारत का ऋणी रहेगा, जिसने उन्हें जीना और आगे बढना सिखाया।” वास्तव में यदि भारत विश्व को गणित का नहीं देता तो विश्व का आगे बढऩा मुश्किल था।
आर्यभट के ‘आर्यभटीयम्’ से ज्ञान होता है कि चौथी शताब्दी तक भारत में गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में कितनी प्रगति हो चुकी थी। वराहमिहिर के ग्रन्थ अपने समय के ज्ञान कोश रहे हैं। ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थों से पता चलता है कि भारत के पौराणिक विचारों ने वैज्ञानिक चिन्तन को किस प्रकार से प्रभावित किया। आज जिन अंक संकेतों को हम अंग्रेजी भाषा का मानते हैं, वे अंक-संकेत प्राचीन ब्राह्मी अंक संकेतों से विकसित है। शास्त्र के रूप में ‘गणित’ का प्राचीनतम प्रयोग लगध ऋषि द्वारा प्रोक्त वेदांग ज्योतिष नामक ग्रन्थ का एक श्लोक में माना जाता है। पर इससे भी पूर्व छान्दोग्य उपनिषद् में सनत्कुमार के पूछने पर नारद ने जो 18 अधीत विद्याओं की सूची प्रस्तुत की है, उसमें ज्योतिष के लिये ‘नक्षत्र विद्या’ तथा गणित के लिये ‘राशि विद्या’ नाम प्रदान किया है। इससे भी प्रकट है कि उस समय इन शास्त्रों की तथा इनके विद्वानों की अलग-अलग प्रसिद्धि हो चली थी। आगे चलकर इस शास्त्र के लिये अनेक नाम विकसित होते रहे।
भारत में अन्य शास्त्रों के विद्वान भी गणित की भावना से ओत-प्रोत रहे हैं। उन शास्त्रों के अलग अलग प्रसंगों में गणित विषयक जानकारियाँ बिखरी पड़ी हैं। पाणिनि ने गणित के अनेक शब्दों की सूक्ष्म विवेचना की है। उन्होंने उस समय की आवश्यकतानुसार प्रतिशत के स्थान पर मास में देय ब्याज के लिये एक ‘प्रतिदश’ अनुपात का उल्लेख किया है। चक्रवृद्धि ब्याज द्वारा सर्वाधिक बढ़ी हुई रकम को ‘महाप्रवृद्ध’ बताया है। पिंगल विरचित छन्दशास्त्र में छन्दों के विभेद को वर्णित करने वाला ‘मेरुप्रस्तार’ पास्कल के त्रिभुज से तुलनीय बनता है। वेदों के क्रमपाठ, घनपाठ आदि में गणित के श्रेणी-व्यवहार के तत्त्व वर्तमान हैं।
प्राचीन भारत में गणित और ज्योतिष का विकास साथ-साथ हुआ। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे श्रेष्ठ गणित ज्योतिषज्ञों की कृतियां इसको प्रमाणित करती हैं। भारत के द्वारा विश्व को दी गई शून्य और दशमलव की अनुपम देन से सभी परिचित हैं। आधुनिक बीजगणित एंव त्रिकोणमिति की मूल भूमि भारत है। इसकी अनेक विधियां सूर्य सिद्धान्त एवं आर्यभट्ट की कृतियों में मिलती है। भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियां जिनसे भारतीय समाज अनभिज्ञ रहा है या जानने का प्रयास नहीं किया। उसे समाज को परिचित कराना हमारा दायित्व है।