क्या विदेशी पढ़ाएंगे हमें संस्कृत?

क्या विदेशी पढ़ाएंगे हमें संस्कृत?

समाचार है कि हरियाणा में हाल ही में स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम को बनाने के लिये जर्मनी तथा कम्बोडिया के विद्वान बुलाए जाएंगे। वे विदेशी विद्वान ही इस संस्कृत विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम को बनायेंगे। यह हास्यास्पद है कि संस्कृत की जन्मभूमि भारत में इस काम के लिए विदेशी विद्वानों को बुलाया जाए। विश्व भर के लोग संस्कृत का अध्ययन करने के लिए भारत आते हैं और विद्वानों के चरणों में बैठकर भाषा सीखते हैं, फिर यह आज कैसी मानसिकता है, जो संस्कृत का पाठ्यक्रम बनाने के लिए विदेशों का मुख देख रही है? हमें स्मरण रखना चाहिए कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने विदेशी संस्कृतज्ञों के लिए कहा था कि यत्र देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरंडोसपि द्रुमायते अर्थात् जिस देश में वृक्ष नहीं होते, वहाँ एरंड के झाड़ को ही वृक्ष मान लिया जाता है।
भारत को यदि समझना है तो भारतीय तत्व दर्शन तथा परम्परा से ही समझा जा सकता है। आयातित विचार प्रवाह और आयातित परम्परा से भारत को नहीं समझ सकते। एक विशेष बात आज के तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवियों में दिखायी दे रही है कि वे अपनी अध्ययनशीलता और विचारशीलता को प्रमाणित करने के लिए विदेशी लेखकों के कथन को प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करते है। यह स्थिति उस भारत के वर्तमान बुद्धिजीवी एवं शिक्षित समाज की है जो कभी विश्वगुरू रहा और आज भी जिसकी ज्ञान ज्योति सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित कर रही है। भारतीय बुद्धिजीवी समाज अपने व्याख्यानों में अपने लेखों में जब आयातित विचारधारा को प्रस्थापित करने के लिए यूरोपीय विद्वानों लेखकों को प्रमाण मान कर विषय की प्रस्तुति करता है तथा श्रोता या पाठक भी उसकी उसी आयातित विचारशैली को प्रमाण मानता है, तो हमारे जैसे भारतीय के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठती है कि जिस भारत ने दुनिया को चलना सिखाया, पढऩा सिखाया, जिसके पास अप्रतिम बौद्धिक सम्पदा हो, उसके ऋषियों की शाश्वत वाणी आज किसी भी विषय को प्रमाणित करने योग्य नहीं क्यों नहीं मानी जाती है?
यह प्रश्न सभी भारतीयों के मन में होना चाहिए। वेद को अन्तिम सत्य मानने वाला देश, आप्त पुरुषों की वाणी को प्रमाण मानने वाले देश की प्रजा आज इतनी पराधीन हो गयी कि उसे अपने पूर्वजों के विचारों पर विश्वास नही रहा। इसका मुख्य कारण है हमारा अपने ज्ञान-विज्ञान से विमुख होना, अपनी भाषा के प्रति उदासीन भाव और शिक्षा में अंग्रेजी भाषा की प्रमुखता। विदेशी भाषा में शिक्षा विदेशी विचारों को ही पोषित करेगी। धीरे-धीरे वही विचार प्रवाह हमारे रक्त में समाहित होकर हमें उसी दिशा में ढकेल देता है। हमे अपने पूर्वजों तथा अपने ग्रन्थों पर विश्वास नही रहता। यदि बात केवल अंग्रेजी भाषा में विदेशी विद्वानों को स्थापित करने तक सीमित रहती तो भी कुछ ठीक था, परंतु अब तो देश में संस्कृत के लिए भी विदेशी विद्वानों पर निर्भर रहा जाने लगा है।
आज भी भारत में संस्कृत के विद्वानों की भरपूर उपलब्धता है। आवश्यकता है कि वे आत्मसम्मान के साथ खड़ा होना सीखें। भारतीय प्रजा को भारतीय बनाये रखने के लिए आवश्यक भारतीय ज्ञान परम्परा को अंगीकृत करना होगा। भारतीय ऋषि मुनियों के कथनों को प्रमाण स्वरुप प्रस्तुत करना होगा। जो अपने पूर्वजों तथा अपने साहित्य पर विश्वास नही करता वह मृत समाज होता है। भारत को अभारतीयता से बचाने के लिए आवश्यक है कि हम अपने साहित्य का अध्ययन करें तथा अपने ऋषियों मुनियों द्वारा स्थापित परम्पराओं पर विश्वास करें तभी हम अपने स्वत्व की रक्षा कर सकते है।