क्या आयुर्वेद से होगी कैंसर मुक्त दुनिया


रवि शंकर
कार्यकारी संपादक


चिकित्सा विज्ञान और तकनीक के आधुनिकतम विकास के बाद भी दुनिया को अभी तक कैंसर का इलाज नहीं मिल सका है। कैंसर होने के शुरुआती चरणों में उपचार संभव है मगर आखिरी चरण में आधुनिक चिकित्सा पद्धति के पास इसका कोई इलाज नहीं है। जो इलाज किया भी जाता है, उसके परिणाम अच्छे नहीं हैं। रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी के बाद रोगी की हालत इतनी खराब हो जाती है कि उसे मौत ही अच्छी लगती है और वैसे भी इन थेरेपियों के बाद उसकी आयु अधिक बचती भी नहीं है।
आयुर्वेद में कैंसर के उपचार का दावा किया जाता है। मगर आधुनिक विज्ञान उसके दावों को स्वीकार नहीं करता। उसे अपनी भाषा में प्रमाण चाहिए होते हैं। ऐसे में अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने आयुर्वेद में कैंसर का ठोस इलाज ढूंढने के लिए एक पहल की है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के कैंसर विभाग और ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (एआईआईए) ने इस पर एक अनुबंध किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ये दोनों संस्थाएं आयुर्वेद में कैंसर के इलाज की संभावनाओं पर अध्ययन और शोध करेंगी। दोनों जांच करेंगी कि क्या आयुर्वेद के पारंपरिक इलाज से आखिरी स्टेज में भी कैंसर के मरीज को बचाया जा सकता है? आईसीएमआर की निदेशक सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं कि इस जानलेवा बीमारी के लिए एलोपैथ और आयुर्वेद सालों से काम कर रहा है। दोनों में इसकी थैरेपी है। मगर आयुर्वेद में उपचार का कोई प्रमाणित दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है। दुनियाभर में आयुर्वेदिक उपचार के ठोस दावों को प्रमाणिकता दिलाने और इसमें सफल इलाज के तरीके ढूंढने के लिए ही यह पहल की गई है।
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के डॉ. हुद्दार बताते हैं कि इस पहल में एलोपैथी और आयुर्वेद को मिला कर कैंसर का इलाज करने का प्रयास किया जा रहा है। कैंसर के इलाज में तीन चीजें हैं – परहेज, सहयोगी इलाज और इलाज। परहेज में जीवनशैली में परिवर्तन, भोजन में सुधार आदि की बात की जाती है। यह हमारी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। आयुर्वेद में इसकी काफी चर्चा है। अब सहयोगी इलाज में भी आयुर्वेद की भूमिका बन रही है। इसमें हम अधिक काम कर रहे हैं।
डॉ. हुद्दार बताते हैं कि कैंसर के रोगियों को सामान्यत: रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी दी जाती है जिसके कारण कुछ दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे कि डर्मोटाइटिस और म्यूकोटाइटिस यानी त्वचा और मुख में सूजन का होना। इन दुष्प्रभावों को समाप्त करके रोगी के जीवन को सुधारने के लिए आयुर्वेद का उपयोग किया जा सकता है। डॉ. हुद्दार बताते हैं कि परहेज और सहयोगी इलाज के साथ-साथ कैंसर की संपूर्ण चिकित्सा के लिए भी शोध किया जा रहा है। इसके लिए आवश्यक डाटा का संग्रह किया जा रहा है।
उल्लेखनीय बात यह है कि अमेरिका भी कैंसर के आयुर्वेदिक इलाज की विधि जानने में रुचि ले रहा है। यूएस नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट को इस शोध के परिणाम साझा किए जाएंगे। सरकार के इस पहल का परिणाम चाहे जो हो, परंतु सच तो यह है कि देश के अनेक आयुर्वेदाचार्य सफलतापूर्वक कैंसर का इलाज कर रहे हैं। उन्होंने बड़ी संख्या में ऐसे रोगियों जिन्हें कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ने निराश कर दिया था कि अब वे कुछ ही महीनों के मेहमान हैं, को न केवल स्वस्थ किया है, बल्कि वे कई वर्षों से कैंसर और दर्दविहीन जीवन जी रहे हैं।
कैंसर का सफलतापूर्वक इलाज करने वाले ऐसे ही एक आयुर्वेदाचार्य है डॉ. रामनिवास पाराशर। देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले डॉ. पाराशर जामनगर, गुजरात में आयुर्वेद पढ़ते समय ही कई प्रयोग करते रहे थे। कैंसर के इलाज की बात पर वे कहते हैं, ‘आज कैंसर के जितने भी इलाज हैं, वे कैंसर के रोग को समाप्त नहीं करते। बीमारी की जो प्रक्रिया शरीर में चल रही होती है, उस पर ये पद्धतियां कुछ काम नहीं करतीं। अभी इम्युनिटी और बॉयोलोजिकल इलाज आए हैं, लेकिन उनका क्षेत्र भी काफी सीमित है। आयुर्वेद आधुनिक पैथियों की भांति केवल कैंसरयुक्त कोशिकाओं को नष्ट मात्र नहीं करता, बल्कि कैंसर रोग का इलाज करता है।’
डा. पाराशर बताते हैं कि वे साधारणत: सहयोगी चिकित्सा वाला काम नहीं के बराबर ही करते हैं। उनका काम कैंसर की मुख्य चिकित्सा करना ही है। वे कहते हैं, ‘कीमोथेरेपी से कई बार रोगी के प्लेटलेट काफी कम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार रोगी आते हैं कि प्लेटलेट को बढ़ाने की कोई दवा दे दें। मैंने ऐसे कुछ रोगियों को दवा दी है। परंतु मैंने कैंसर के रोग की चिकित्सा की है। अंतिम चरण के कैंसर की भी चिकित्सा की है और सफलता भी मिली है। मेरे पास आने वाले अधिकांश रोगी रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी आदि सब करवा चुके थे। उन्हें या तो डॉ. ने कह दिया था कि अब उनका और इलाज संभव नहीं है और वे कुछ महीनों के मेहमान हैं या फिर उन्हें 2-3 बार कीमोथेरेपी की गई जिसके दुष्प्रभाव काफी आ गए थे या फिर कीमोथेरेपी से रोग उलटा बढ़ गया था। कुछ ऐसे रोगी भी आए, जिनकी आयु अथवा बॉयोकेमिकल अवस्थाओं के कारण कीमोथेरेपी या रेडियोथेरेपी या कोई और चिकित्सा संभव ही नहीं थी। ऐसे रोगियों में भी 70 प्रतिशत सफलता मिली है। यानी जिन्हें आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ने शतप्रतिशत असफल मान लिया था, उनमें 70 प्रतिशत की सफलता मिली। इनमें से भी 25-30 प्रतिशत रोगियों को कैंसर से पूरी तरह मुक्ति मिली है।’
आमतौर पर कीमोथेरेपी या सर्जरी से कैंसरमुक्त होने वाले रोगियों में फिर से कैंसर होने का खतरा भी बना ही रहता है। ऐसे रोगी भी आयुर्वेद की शरण में आते हैं। ऐसे एक रोगी की जानकारी देते हुए वे बताते हैं, ‘एक कैंसर की रोगी महिला की तीन वर्ष के अंदर पाँच सर्जरी हुई थी, रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी के प्रोटोकोल भी पूरे कर लिए गए थे। उसके बाद उन्हें बताया गया था कि इससे अधिक और कुछ नहीं किया जा सकता, वे दो-तीन महीने और जी सकेंगी। फिर वे मेरे पास आईं। मेरे यहाँ लगभग डेढ़ वर्ष उनका इलाज चला और अभी प्रत्येक वर्ष एक बार उनका विशेष औषधियों से बस्ती कर्म द्वारा डिटॉक्सीफिकेशन किया जाता है और वे पिछले 12 वर्षों से सामान्य जीवन जी रही हैं।Ó
डॉ. पाराशर के पास ऐसे अनेक उदाहरण हैं। कैंसर के तीसरे-चौथे चरण के ही नहीं, बल्कि अंतिम चरण के रोगी भी आयुर्वेद की चिकित्सा के बाद सामान्य जीवन जी रहे हैं। ऐसे ही एक और रोगी के बारे में वे बताते हैं, ‘एक रोगी 70 वर्ष की आयु का था। उसकी बड़ी आँत में कैंसर था। दिल्ली के एक नामी अस्पताल में उनका ऑपरेशन किया गया। परंतु अंदर संक्रमण इतना फैल गया कि लीवर में भी कैंसर आ गया और पूरा पेट बाहर से ऐसा दिखने लगा मानो फट जाएगा। पेट की त्वचा इतनी लाल हो गई थी जैसी आँतों की अंदर से होती है। अस्पताल वालों ने उसे उसी अवस्था में निकाल दिया कि यदि वहाँ उसका पेट फट गया तो अस्पताल में संक्रमण फैल जाएगा। ऐसी अवस्था में वह रोगी मेरे पास आया और आज सात वर्ष हो गए हैं, वह पूर्ण रूप से स्वस्थ है। डॉ. पाराशर बताते हैं कि ऐसे स्वस्थ हुए रोगी तो बहुत हैं, उन्हें केवल उन्हीं की जानकारी होती है, जो किसी न किसी कारण से आते रहते हैं या फिर किसी अन्य रोगी को भेजते हैं।
कैंसर की आयुर्वेदिक चिकित्सा काफी सस्ती भी है। डॉ. रामनिवास पाराशर सामान्यत: प्रतिमास तीस हजार रूपये की फीस लेते हैं जिसमें दवा इत्यादि का खर्च शामिल होता है। यह राशि बीमारी की गंभीरता के अनुसार घटती बढ़ती है। अनुमानत: छह महीने की चिकित्सा नियमित करानी पड़ती है। उसके बाद समय-समय पर जाँच और डिटाक्सीफिकेशन मात्र ही कराना पड़ता है। यानी यदि सारे खर्च जोड़ लिए जाएं तब भी यह दो से ढाई लाख रूपये ही पड़ता है जो कि एलोपैथिक चिकित्सा के खर्च से काफी कम है। साथ ही ठीक होने की संभावना भी एलोपैथ चिकित्सा की तुलना में काफी अधिक है।
कैंसर की सफल चिकित्सा करने वाले एक और वैद्य हैं डॉ. सुभाष नायक। डॉ. नायक हरिद्वार में रहते हैं और लंबे समय तक पतंजलि के साथ जुड़ कर सेवा देते रहे हैं। डॉ. नायक कहते हैं, Óमैं पिछले बीस वर्षों से आयुर्वेद का अभ्यास कर रहा हूँ। कैंसर के रोगी सामान्यत: हमारे पास तब आते हैं, जब वे हर जगह से निराश हो चुके होते हैं, उन्हें भी आयुर्वेद की दवाओं से लाभ होता है। इसलिए आयुर्वेद कैंसर को पूरी तरह ठीक कर सकता है। आयुर्वेद स्वास्थ्य को बनाए रखने और उसको पुनस्र्थापित करने का काम करता है। जब स्वास्थ्य पुनस्र्थापित होता है तो रोग अपने आप ठीक होते हैं।
डॉ. सुभाष नायक बताते हैं, ‘मेरा अनुभव है कि लगभग सभी प्रकार के कैंसर को आयुर्वेद से ठीक किया जा सकता है। मैंने स्वयं भी हजारों कैंसर रोगियों का सफल उपचार किया है। आमतौर पर मुख, गले, फेफड़े, प्रोस्टेट आदि किसी अंगविशेष में होने वाले कैंसर मैंने ठीक किए हैं। गर्भाशय और स्तन कैंसर को ठीक करने में कठिनाई आती है, हालांकि स्तन कैंसर में भी कुछ रोगियों को मैंने पूरी तरह ठीक किया है। ब्लड कैंसर जैसे कुछ कठिन कैंसर को नियंत्रित करने में भी कठिनाई रहती है।’
डॉ. सुभाष नायक बताते हैं कि आयुर्वेद में केवल दवाएं नहीं होतीं। स्वस्थ रहने की समग्र प्रणाली को आयुर्वेद कहते हैं। दवाओं के अतिरिक्त खानपान, दिनचर्या, प्राणायाम, योग आदि सब मिलाकर प्रयोग करने से लाभ मिलता है। जो रोगी पंचकर्म कराने योग्य स्वस्थ होते हैं तो उन्हें पंचकर्म भी कराने से लाभ होता है। डॉ. नायक का भी कहना है कि कैंसर की आयुर्वेदिक चिकित्सा एलोपैथ की तुलना में सस्ती पड़ती है।
देखा जाए तो देश में कैंसर की चिकित्सा करने वाले वैद्यों और आयुर्वेदिक संस्थानों की कमी नहीं है। कमी है तो उन पर भरोसा करने की। आम तौर पर कैंसर का पता चलते ही रोगी और उसके परिवार वाले आतंकित हो जाते हैं। सामान्य अवधारणा बन चुकी है कि कैंसर ने केवल असाध्य है, बल्कि उसकी चिकित्सा काफी मंहगी है। ऐसे में कैंसर होने की जानकारी मात्र मिलने से रोगी की आधी जान निकल जाती है। रही सही कसर मंहगी एलोपैथिक चिकित्सा और मंहगे अस्पताल पूरी कर देते हैं।
ऐसी स्थिति में आयुर्वेद कैंसररोगियों का एक बड़ा सहारा बन सकता है। आयुर्वेद न केवल सफल चिकित्सा सुनिश्चित करता है, बल्कि चिकित्सा के बाद अच्छे स्वस्थ जीवन की आशा भी जगाता है और यह रोगियों की जेबें भी खाली नहीं करता। ऐसे में प्रश्न उठता है कि सरकार आयुर्वेदिक चिकित्सा पर जो शोध करना या करवाना चाह रही है, क्या उसकी शुरुआत इन वैद्यों द्वारा चिकित्सा किए गए सफल मामलों से नहीं की जा सकती? क्या इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का कैंसर विभाग ऐसे वैद्यों को अपने यहाँ आमंत्रित करके उनके अनुभवों का लाभ नहीं ले सकता? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ये वैद्य केवल परंपरा वाले अशिक्षित वैद्य ही हैं। डॉ. रामनिवास पाराशर और डॉ. सुभाष नायक दोनों ही आधुनिक डिग्रीधारक भी हैं। ऐसे और भी वैद्यों को ढूंढा जा सकता है। क्या सरकार कभी इन वैद्यों का कोई सम्मेलन बुलाने पर विचार कर सकती है, जिससे कैंसर का सस्ता और सुनिश्चित चिकित्सा देश की जनता को उपलब्ध कराने में आसानी हो सके?

इलाज और उनके दुष्प्रभाव
कीमोथेरेपी
कैंसर के उपचार हेतु प्रयुक्त दवाओं या रसायनों के उपयोग को कीमोथेरेपी कहा जाता है। ये दवायें विभाजित होती कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करती हैं। साथ ही यह शरीर के कुछ स्वस्थ ऊतकों को भी प्रभावित करती है, जहाँ कोशिकायें निरंतर विभाजित होती रहती हैं। जैसे पाचन तंत्र की त्वचा, बालों के रोग, अस्थि मज्जा, त्वचा आदि। इस कारण इसके दुष्प्रभाव सामने आते हैं।
रेडियोथेरेपी
इसे विकिरण थेरेपी (बिजली की सिकाई) भी कहा जाता है। इस थेरेपी में उच्च ऊर्जा की किरणे कैंसर प्रभावित भाग पर डाली जाती है, जिनमें कैंसर सैल्स को नष्ट कर उनका विभाजन रोकने की क्षमता होती है। परन्तु उपचार के दौरान कुछ स्वस्थ ऊतक भी प्रभावित होते है, जो दुष्परिणामों के लिये जिम्मेदार हैं।
हार्मोन थेरेपी
इस थेरेपी में कुछ विशेष हारमोन्स कैंसर से पीडि़त व्यक्ति को दिये जाते हैं। हार्मोन्स जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन विशेषकर स्तन कैंसर में उपयोगी पाये गये हैं। यह थेरैपी स्तन कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर (पौरुष ग्रंथि) और एंडोमीट्रीयल कैंसर (गर्भाशय का कैंसर) के उपचार में प्रयोग की जाती है।
इन सभी इलाजों के दुष्प्रभाव काफी अधिक हैं। सामान्यत: इनसे रोगी को यदि कैंसर से मुक्ति मिल भी जाती है तो उसका जीवन कष्टमय हो जाता है। इसके अलावा कई बार दुष्प्रभावों के बढ़ जाने पर इलाज भी रोकना पड़ता है।

कैंसर के सात मुख्य संकेत एवं लक्षण
1. आंत या मूत्राशय की आदतों में परिवर्तन
2. घाव जो जल्दी न भरे
3. शरीर के किसी भी हिस्से में असामान्य रक्तस्राव या स्राव
4. वजन में अस्पष्टीकृत गिरावट या भूख न लगना
5. निगलने में परेशानी या पुरानी अपच
6. तिल या मस्से में कोई परिवर्तन
7. लगातार खांसी या आवाज में भारीपन

यदि हम निम्न उपायों का ध्यान रखें तो कैंसर होने के खतरे को कम किया जा सकता है।
1. स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जागरूक रहें। उदाहरण के लिये तंबाकू सेवन न करें, शराब का सेवन न करें या सीमित मात्रा में ही करें और आदर्श वजन बनाएं रखें।
2. कैंसर के संकेत एवं लक्षण के बारे में जागरूक रहें।
3. रसायनमुक्त अनाज, फल तथा सब्जियों का ही प्रयोग करें।
4. आयुर्वेद में वर्णित आहार-विहार का पालन करें। विरूद्ध आहार कभी न लें। मौसमी फलों तथा सब्जियों का ही सेवन करें।
5. वर्ष में एक बार पंचकर्म अवश्य करवाएं। इससे शरीर में संचित विष निकल जाता है और शरीर के सभी अंगों को नई शक्ति मिल जाती है।

बढ़ती बीमारी हारता विज्ञान

विश्व स्वास्थ्य संगठन की संस्था ग्लोबोकेन, जोकि कैंसर पर शोध करने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी है, के वर्ष 2012 के आंकड़ों के अनुसार भारत में पुरुष व महिलाओं में कैंसर के 10,14,934 नए मामले सामने आए हैं और 17,90,498 पुराने कैंसरपीडि़त दजऱ् किये गये और निदान के पाँच वर्षों के अंदर 6,82,830 लोगो की मृत्यु हुई। ये आंकड़े निश्चित रूप से भयावह हैं। ये आंकड़े कैंसर को महामारी का दर्जा देने के लिए पर्याप्त हैं। प्रश्न उठता है कि आज से कुछ दशक पहले जिस बीमारी का नाम भी लोगों को ठीक से पता नहीं था, उसने एकदम से महामारी का रूप कैसे ले लिया? आखिर कैंसर के इतनी तेजी से बढऩे के क्या कारण हैं? प्रश्न यह भी है कि आखिर विज्ञान और तकनीकी के विकास के आज के युग में भी विज्ञानी इसका इलाज क्यों नहीं ढूंढ पा रहे हैं?
यदि हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा लाइलाज बीमारियों के नाम याद करें तो हमें ध्यान आएगा कि उनमें से अधिकांश बीमारियां जीवनशैलीजन्य हैं यानी खराब रहन-सहन और गलत खानपान से पैदा होती हैं। उदाहरण के लिए मधुमेह, हृदय रोग, रक्तचाप आदि बीमारियों के नाम लिए जा सकते हैं। इसलिए आधुनिक चिकित्सा प्रणाली जो कि केवल रोगों के बैक्टीरिया को नष्ट करने और संक्रमण के कारण खराब हो गए अंगों को ऑपरेशन द्वारा निकाल देने तक ही सीमित है, जीवनशैलीजन्य बीमारियों पर पूरी तरह निष्प्रभावी है। दूसरी ओर आयुर्वेद जो कि शरीर और उसके अंगों के स्वास्थ्य को संरक्षित करने तथा उन्हें अधिक कार्यक्षम बनाने पर जोर देता है, इनका सफलतापूर्वक इलाज करता है। उपरोक्त उदाहरण को ध्यान में रखें और कैंसर होने के कारणों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि यह भी एक जीवनशैलीजन्य बीमारी ही है और इसलिए आधुनिक चिकित्सा प्रणाली इसका कोई इलाज नहीं ढूंढ पा रही है। यही कारण है कि आयुर्वेद के विशेषज्ञ इसका इलाज कर पा रहे हैं। आइये, देखते हैं कैंसर क्या है, यह क्यों होता है और आखिर इसे हम जीवनशैलीजन्य बीमारी क्यों कह रहे हैं?
शरीर की कोशिकाओं के समूह की असामान्य एवं अव्यवस्थित वृद्धि को कैंसर कहते हैं। कैंसर हमारी कोशिकाओं के भीतर डीएनए (आनुवांशिक सामग्री) की क्षति के कारण होता है। डीएनए की क्षति सभी सामान्य कोशिकाओं में होती रहती है। लेकिन इस क्षति का सुधार हमारे स्वयं के शरीर द्वारा हो जाता है। कभी कभी इस क्षति का सुधार नहीं हो पाता जिससे कोशिकाओं के गुणों में परिवर्तन हो जाते हैं। संचित डीएनए की क्षति अंत में कैंसर को जन्म दे सकती है। यदि समय पर जांच व इलाज न हो तो यह शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है। समझने की बात यह है कि कैंसर कोई संक्रमण नहीं है। हालांकि कुछ रोगजनकों के साथ लंबी अवधि के संक्रमण कैंसर का कारण बन सकते हैं। उदाहरण के लिये एच.पी.वी. के साथ संक्रमण गर्भाशय के मुख के कैंसर का कारण बन सकते है। हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी वायरस के संक्रमण से जिगर का कैंसर हो सकता है। हेलिकोबेक्टर द्वारा अमाशय का कैंसर पैदा हो सकता है। फिर भी यह पाया गया है कि इन रोगजनकों से संक्रमित अधिकांश लोगों में कैंसर का विकास नहीं होता है। इससे भी यह स्पष्ट है कि संक्रमण के कारण कैंसर नहीं होता।
वास्तव में कैंसर होता है बदलती जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रदूषण और औद्योगीकरण के कारण। कैंसर होने का एक प्रमुख कारण है आधुनिक रसायनों का हमारे खाद्य श्रृंखला में बढ़ता प्रयोग। अनाज, फल और सब्जियां पैदा करने के लिए आज खाद और कीटनाशकों के रूप में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। भोजन पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्रिजर्वेटिव के रूप में रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ये रसायन हमारे शरीर में डीएनए को प्रभावित करते हैं और कैंसर को पैदा करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है, जहाँ रासायनिक खेती के कारण अनाज इतना जहरीला हो गया है कि वहाँ कैंसर के सबसे अधिक रोगी पाए जाते हैं।
कैंसर होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण है नशा। तम्बाकू और शराब कैंसर के दो सबसे बड़े कारक हैं। जो लोग शराब का अधिक सेवन करते हैं, उन्हें मुख का कैंसर, लीवर कैंसर, स्तन कैंसर, अंतडिय़ों का कैंसर और गले का कैंसर होने की संभावना अधिक होती हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि कैंसर मूलत: जीवनशैलीजन्य बीमारी ही है और यदि हम अपने आहार-विहार को ठीक कर लें तो कैंसर से बच सकते हैं। इस बात को एलोपैथिक चिकित्सकों ने भी जान लिया है और इसलिए वे कैंसर से बचाव और इलाज में आयुर्वेद का उपयोग करने लगे हैं। हालांकि अभी उन्होंने आयुर्वेद को कैंसर को पूरी तरह ठीक करने में सक्षम नहीं माना है, परंतु उन्हें इतना तो मानना ही पड़ा है कि आयुर्वेद के अनुसार जीवनशैली अपनाने से कैंसर से बचा जा सकता है।

नीम हराएगा कैंसर को

नीम के औषधीय गुण तो सदियों से जगजाहिर हैं। अब तक इसका उपयोग छोटी मोटी बीमारियों के इलाज के अलावा जीवाणुओं और कीटाणुओं से लडऩे में किया जाता है। लेकिन अब कोलकाता स्थित चितरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (सीएनसीआई) के वैज्ञानिक नीम से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं। कोलकाता स्थित संस्थान के वैज्ञानिकों की एक टीम ने लंबे अरसे तक चले परीक्षण के बाद प्रकाशित अपने दो शोध प्रपत्रों में बताया है कि नीम के पत्तियों से निकलने वाले एक खास किस्म के संशोधित प्रोटीन नीम लीफ ग्लाइकोप्रोटीन यानी एनएलजीपी के प्रयोग से चूहों में ट्यूमर कोशिकाओं की वृद्धि रोकने में सफलता मिली है। यह प्रोटीन कैंसर से सीधे लडऩे की बजाय ट्यूमर से निकलने वाले जहरीले व घातक रसायनों के खिलाफ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर देता है। ये प्रतिरोधक कोशिकाएं कैंसर जैसी घातक बीमारियों से शरीर की रक्षा करती हैं। इस शोध टीम के प्रमुख और सीएनसीआई के प्रतिरोधी विभाग के अध्यक्ष रथींद्रनाथ बराल कहते हैं, ‘हमने अपने अध्ययन में पाया कि एनएलजीपी में ट्यूमर कोशिकाओं और ट्यूमर के विकास में सहायक गैर परिवर्तित कोशिकाओं से जुड़ी ट्यूमर की सूक्ष्म पारिस्थितिकी को सामान्य करने की शक्ति मौजूद है। मूल रूप से एनएलजीपी ट्यूमर की सूक्ष्म पारिस्थतिकी में ऐसे बदलाव लाता है, जिससे उसका विकास रुक जाता है।’
वह कहते हैं कि कैंसर कोशिकाएं धीरे धीरे विकसित होने पर प्रतिरोधक कोशिकाओं पर नियंत्रण कर लेती हैं। ऐसे में रोग से बचाने की जगह यह कोशिकाएं उल्टे कैंसर को फैलने में सहायता देने लगती हैं। ‘ह्यूमन इम्यूनोलॉजी’ नाम की मेडिकल पत्रिका में प्रकाशित शोध प्रपत्र में इन वैज्ञानिकों ने सर्वाइकल कैंसर से पीडि़त 17 मरीजों की कैंसर कोशिकाओं पर किए प्रयोग के नतीजे का भी खुलासा किया है। इस अध्ययन से उन्हें नीम की पत्तियों की सहायता कैंसर के विकास पर अंकुश लगाने तरीके का पता चल गया। बराल कहते हैं, ‘इससे पहले के कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में कहा गया था कि नीम प्रजनन तंत्र पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। लेकिन हमने अपने शोध के जरिए इस संभावना को खारिज कर दिया है।’ बराल और उनके सहयोगी पिछले 13 वर्षों से इस शोध में जुटे हुए हैं। बराल बताते हैं कि उनकी टीम अब इस प्रोटीन की और बारीकी से जांच करके पता लगाएगी कि इसका कौन सा तत्व सही मायने में सक्रिय है। इसकी वजह यह है कि इस प्रोटीन में तीन हिस्से हैं। टीम की कोशिश यह पता लगाने की है कि यह प्रोटीन रेजिस्टेंट कैंसर के मामलों में भी प्रभावशाली होगा या नहीं। वह कहते हैं, ‘एक खास चरण के बाद कैंसर वाले ट्यूमर लाइलाज हो जाते हैं। उन पर रेडियोथेरेपी या कीमोथेरेपी का भी कोई असर नहीं होता।’
बराल को उम्मीद है कि नीम लीफ ग्लाइकोप्रोटीन ऐसे मामलों में कैंसर के इलाज को प्रभावशाली बना सकेगा। वह बताते हैं कि प्रतिरोधक कोशिकाओं में कैंसर को मारने वाली कोशिकाओं का एक समूह होता है जिसे सीडी8 प्लस टी कोशिकाएं कहते हैं। एनएलजीपी की वजह से टी कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है। इससे कैंसर को विकसित होने से रोकने में सहायता मिलती है। यही प्रोटीन टी कोशिकाओं को निष्क्रिय होने से भी बचाता है। अब परीक्षण की इस प्रक्रिया को ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया समेत विभिन्न नियामक संस्थाओं के सामने पेश किया जाएगा। वहां से अनुमोदन मिलने के बाद मनुष्यों पर इसका परीक्षण शुरू किया जाएगा। नीम से बना होने की वजह से आशा है कि यह चिकित्सा काफी सस्ती होगी। वर्तमान में कैंसर का इलाज अत्यधिक महंगा है।