कैसे स्वस्थ हो देश ?

रवि शंकर
कार्यकारी संपादक


आज के राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र के तीन ही प्रमुख मुद्दे हैं – शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार। तीनों ही आज सरकार यानी राज्य-व्यवस्था पर आश्रित हैं। आज की सरकारें ही तय करती हैं कि शिक्षा किसको, कैसे और कौन-सी मिले। सरकारें ही तय करती हैं कि लोगों को कौन सी चिकित्सा पद्धति से स्वास्थ्य प्रदान किया जाए। और सरकारें ही तय कर रही हैं, कि लोग किन रोजगारों में लगें। सरकार या राज्य व्यवस्था द्वारा लोगों को स्वस्थ रहने की व्यवस्था करना भारत के लिए काफी नई व्यवस्था है। इसका इतिहास कठिनाई से सौ-डेढ़ सौ वर्षों का ही है। अंग्रेजों का शासन आने से पहले देश में स्वास्थ्य समाज का उत्तरदायित्व था, शासन का नहीं। अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को बदला। उन्होंने पहले केवल स्वयं के लिए व्यवस्थाएं बनाई थीं। जो भी यूरोपीय दल भारत आता था, वह अपने साथ वहाँ से चिकित्सकों का एक दल लेकर आता था। इसका कारण भी बहुत स्पष्ट है। यूरोपीय भारत में पडऩे वाली गर्मी को सहन नहीं कर पाते थे और शीघ्र बीमार पड़ जाते थे। साथ ही समुद्री रास्ते जोकि अफ्रीका का पूरा चक्कर लगाने के कारण लगभग एक से डेढ़ वर्ष का होता था, में भी बीमारी का प्रकोप होता था। इसलिए वे अपने साथ चिकित्सकों दल भी लेकर चलते थे।

हैरानी की बात यह है कि वे उन चिकित्सकों को सर्जन यानी शल्य चिकित्सक कहा करते थे। वास्तव में उस समय यूरोप का चिकित्साविज्ञान इतना पिछड़ा हुआ था कि उन्हें सामान्य बुखार जैसे बीमारियों का इलाज भी पता नहीं था। चिकित्साशास्त्र के यूरोपीय ज्ञान को हम इससे ही समझ सकते हैं कि 14वीं शताब्दी में पूरे विश्व में जो प्लेग का प्रकोप फैला, उससे सर्वाधिक नुकसान यूरोप को ही झेलना पड़ा। इसका एकमात्र कारण चिकित्साशास्त्र की सही जानकारी का अभाव ही था। 17वीं शताब्दी तक दवाओं से किए जाने वाले उपचार को विचक्राफ्ट यानी चुड़ैलों वाले काम माना जाता था और उन्हें फांसी देने से लेकर जिंदा जलाने तक के काम यूरोप में किए जा रहे थे। मेडिसीन के नाम पर उनकी पढ़ाई केवल हिप्पोक्रेटस तक सीमित थी। 19वीं शताब्दी तक आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में डॉक्टर बनने के लिए कुल छह वर्षों का पाठ्यक्रम होता था, जिसमें चार वर्ष तक उन्हें केवल हिप्पोक्रेटस की दो पुस्तकों थियोरिका और प्रैक्टिका का अध्ययन करना होता था और उसके बाद दो वर्ष तक रिजेंट के विद्यालयों में अभ्यास करना होता था। वे सर्दी-जुकाम और बुखार जैसी बीमारियों के लिए भी नस काट कर दूषित खून निकालने जैसे बचकाने इलाज किया करते थे। वर्ष 1799 में ऐसे ही एक इलाज में अधिक खून बह जाने के कारण केवल सर्दी-जुकाम से पीडि़त अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन की मौत हो गई थी।

अंग्रेजों ने अपनी इसी अंधविश्वासी चिकित्सा व्यवस्था को भारत पर शासन करने के क्रम में थोपा। उन्होंने भारत की युगोंपुरानी चिकित्सा व्यवस्था को नकारा, दबाया और प्रतिबंधित किया। उन्होंने चिकित्सा करने के लिए भी लोगों को लाइसेंस बाँटे। केवल उनके द्वारा लाइसेंस प्राप्त लोग ही चिकित्सा के योग्य घोषित किए जाने लगे। उन्हें डॉक्टर और रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टिशनर कहा जाता था। इस प्रकार सरकार की स्वास्थ्य नीति की शुरुआत अंग्रेजों ने की। उन्होंने सरकार की स्वास्थ्य नीति इसलिए नहीं बनाई थी कि इससे लोगों को अच्छा स्वास्थ्य मिले। उन्होंने यह नीति इसलिए बनाई थी ताकि देश में औपनिवेशिकरण तेज हो सके। यूरोपीय विशेषकर अंग्रेजों ने जब भारतीय चिकित्सा व्यवस्था का सर्वे प्रारंभ किया तो उनका ध्यान प्रारंभ में यूरोपीय लोगों के स्वास्थ्य पर ही था। डेविड अर्नाल्ड लिखते हैं, ‘भारतीय रोगों पर प्रारंभिक यूरोपीय अनुसंधानों को छोड़ दें और तथ्यों को थोड़ा अधिक सरलीकृत कर दें तो हम वर्ष 1770 से 1850 तक भारतसंबंधी ब्रिटिश चिकित्सकीय अनुसंधानों में एक प्रकार का विषयवस्तु आधारित विकास देख सकते हैं। वर्ष 1773 में जॉन क्लार्क की पुस्तक ऑब्जर्वेशन्स ऑन द डिजिजेज इन लाँग वोयेजेज टू हॉट कंट्रीज मुख्यत: यूरोपीयों विशेषकर नाविकों के स्वास्थ्य से संबंधित था। ऐसा ही एक संकुचित और बाह्य दृष्टिकोण वर्ष 1802 में चाल्र्स कुर्टिस की पुस्तक एन एकाउंट ऑफ द डिजिजेज ऑफ इंडिया, एज देय अपीयर्ड इन द इंग्लिश फ्लीट एंड इन द नेवल हास्पीटल ऑफ मद्रास इन 1782-83 में देखा जा सकता है। वर्ष 1804 में विलियम हंटर की पुस्तक एस्से ऑन द डिजिजेज इसिडेंट टू इंडियन सी-मेन ऑर लास्कर्स ऑन वोयेजेज में भारतीयों की चिकित्सा पर भी ध्यान दिया गया था, परंतु केवल उन्हीं पर जो कंपनी के समुद्र में जाने वाले कर्मचारी थे।Ó अर्नाल्ड ने और भी ढेर सारे उदाहरण दिए हैं, जिनसे यह साबित होता है कि कम से कम उत्तर भारत में यूरोपीय चिकित्सासंबंधी जाँच पड़ताल का उद्देश्य भारतीयों की स्थिति सुधारना नहीं, बल्कि यूरोपीयों को भारत के वातावरण के कारण होने वाले रोगों से बचाना भर ही था। इस क्रम में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत में प्लेग और चेचक जैसी महामारियां यूरोपीय संक्रमण के कारण ही आई थीं। इसे ठीक से समझना हो तो हम लातिनी अमेरिका की माया सभ्यता के यूरोपीय संपर्क के इतिहास को भी पढ़ सकते हैं, जहाँ यूरोपीय संपर्कों के कारण चेचक जैसी महामारियां फैलीं और लाखों स्थानीय लोग मौत के मुँह में समा गए। कुछ यही स्थिति भारत की भी हो रही थी, परंतु यहाँ के आयुर्वेदिक वैद्यों ने इससे बचने का उपाय ढूंढ निकाला था। भारत में चेचक तो था, पर महामारी नहीं थी।

बहरहाल, अंग्रेजों ने जो व्यवस्था बनाई, उसने भारत की पुरानी और सक्षम चिकित्सा व्यवस्था को नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया। आयुर्वेद और सिद्ध जैसी प्रभावी चिकित्सा व्यवस्थाओं को अवैज्ञानिक और पिछड़ा बताया जाने लगा। परंतु यह देखने लायक बात है कि भारत में अ_ारहवीं शताब्दी तक स्वास्थ्य तथा चिकित्सा व्यवस्था के जो प्रमाण मिलते हैं, वे एक अलग ही कहानी कहते हैं। यह देखना रोचक हो सकता है कि जब तक देश में राज्य पर निर्भर चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी, तब तक देश में आमजन का स्वास्थ्य कहीं बेहतर था। देश में वैद्य तो हरेक गाँव में मिलते थे, परंतु अस्पताल नहीं होते थे। किसी भी राजा ने हर गाँव में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोलने का प्रयास नहीं किया। यहाँ तक कि कौटिल्य जैसे महानतम राजनीतिक आचार्य ने भी अस्पताल नहीं बनवाए। इसका यह अर्थ नहीं है कि देश में अस्पताल होते ही नहीं थे। अस्पताल होते थे, परंतु पशुओं के। पशुओं के लिए बड़े-बड़े अस्पताल होते थे।

ऐसे ही एक अस्पताल का उल्लेख विंसेंट स्मिथ ने अपनी पुस्तक में किया है। विन्सेंट स्मिथ लिखते हैं – सूरत का सबसे प्रतिष्ठित भवन था बैनयन (वटवृक्ष) अस्पताल। इसका सबसे आधुनिक वर्णन 1780 का मिलता है। वर्ष 1772 में इसमें घोड़े, बैल, गधे, भेड़, बकरी, बंदर और कबूतर तथा अन्यान्य पक्षी थे। इनके अलावा यहाँ एक बूढ़ा कछुआ भी था जो लगभग 75 वर्षों से यहीं था। यहाँ का सबसे असाधारण विभाग था चूहों, कीड़ों, जहरीले जीवों का। यह उद्धरण यह तो साबित करता है कि भारत में बड़े-बड़े अस्पताल बनाए गए थे, परंतु वे जानवरों के अस्पताल थे और वे सौ-सौ वर्ष तक प्रयोग में थे। यानी हमें अस्पताल तो बनाते थे, परंतु मनुष्यों के लिए नहीं। इसका एक ही कारण हो सकता है कि उस समय मनुष्यों के लिए अस्पतालों की इतनी आवश्यकता रही ही नहीं होगी। परंतु गाँव-गाँव में वैद्यों और चिकित्सकों की टोलियाँ अवश्य हुआ करती थीं।

भारत में चिकित्सकों की स्थिति का वर्णन करते हुए भारत में चिकित्सकों की स्थिति का एक विवरण निकलॅस थोडे जेनसन इन शब्दों में देते हैं, ‘भारत की अन्य यूरोपीय कॉलोनियों की भांति ही ट्रांक्वीबार में चिकित्सा को दो भागों में बांटा जा सकता है – यूरोपीय और भारतीय। यूरोपीय चिकित्सा तंत्र में कम से कम तीन लोग होते थे, रेजिमेंट या अस्पताल का हेडसर्जन, उसका असिस्टेंट या सेकेंड सर्जन और प्रोटेस्टैंट मिशन में नियुक्त चिकित्सक। इसके अलावा यूरोपीय जलसेना या जहाजों के सर्जन भी होते थे, परंतु सभी को मिला कर भी उनकी संख्या छह से अधिक नहीं होती थी। इसके विपरीत भारतीय चिकित्सा तंत्र की स्थिति काफी मजबूत थी। भारतीयों में पहले तो हिंदू, ईसाई और मुस्लिम तीनों वर्गों के चिकित्सक होते थे। वर्ष 1790 के ट्रांक्वीबार के अधिकृत जनगणना में हिंदू चिकित्सक या तो वैद्य या नाई के रूप में दर्ज किए गए और वे वेदुगेन(वादुगा), नौइदेन (नवीदेन) और वेलालेन (वेलाला) जातियों के थे। शहर में कुल आठ हिंदू चिकित्सक थे जिनमें छह वैद्य थे और दो नाई। ईसाई भारतीय चिकित्सक तीन थे, एक वेदुगेन जाति का कैथोलिक वैद्य और नौइदेन जाति के दो नाई। मुस्लिम चिकित्सक केवल एक था।

निकलॅस लिखते हैं कि इन भारतीय चिकित्सकों में वैद्यों और नाइयों के अलावा तीन और वर्ग जोड़े जा सकते हैं अनुभववादी, हड्डी बिठाने वाले और लौकिक। अनुभववादी संभवत: नाड़ी वैद्य होते होंगे। लौकिक से उनका अभिप्राय स्पष्ट नहीं है। यह विवरण बताता है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति कितनी बेहतर रही होगी। यही कारण है कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में आई यूरोपीय ईसाई मिशनरियों ने सभी काम छोड़ कर केवल यहाँ के ज्ञान संपदा को एकत्र करने का काम किया। जर्मन और डेनिश मिशनरियों ने वर्ष 1700 से 1900 तक दो शताब्दियों में काफी कुछ तमिल लोगों से सीखा और यहाँ का साहित्य और ज्ञान पुस्तकों और डायरी नोटिंग के रूप में ले गए। तमिलों के अध्ययन में उनकी रूचि इतनी बढ़ी की इंडोलोजी की भांति एक तमिललोजी ही उन्होंने विकसित कर दी। यूजीसी एक प्रोजेक्ट के तहत प्रो. सी एस मोहनवेलू ने एक जर्मन मिशनरी जिगेनबाग द्वारा भारत से ले गए पुस्तकों और डायरी नोटिंग की एक सूची बनाई है। यह सूची कुल 525 पृष्ठों की है और इस सूची में विज्ञान और तकनीक का एक खंड है। इस खंड को पढऩे से पता चलता है कि तमिलों का चिकित्साशास्त्र का ज्ञान यूरोपीय चिकित्साशास्त्र से कहीं अधिक विकसित और गहरा था। इस सूची में सांप, बिच्छू, कुत्ते आदि विभिन्न प्रकार के जहरीले जीवों के काटने का इलाज, रक्तचाप का इलाज तथा अन्यान्य तमिल औषधियों का विवरण है।

आश्चर्य और प्रसन्नता की बात यह है कि अंग्रेजों और बाद में स्वाधीन भारत की सरकारों के सभी प्रयासों के बाद भी स्थानीय भारतीय चिकित्सकों का यह विशाल संजाल नष्ट नहीं हो पाया। यह संजाल आज भी कार्यरत है। बल्कि देखा जाए तो आज भी लोगों को स्वास्थ्य उपलब्ध कराने में इनकी बड़ी भूमिका है। इस संजाल में सरकारी आयुर्वेदिक कॉलेजों से पढ़ाई करने वाले वैद्यों की संख्या काफी कम है, अधिकांश संख्या परंपरा से वैद्यकी करने वाले लोगों की है, जिनके पास न कोई प्रमाणपत्र है और न ही कोई लाइसेंस। परंतु वे न केवल इलाज कर रहे हैं, बल्कि प्रभावी इलाज कर रहे हैं। देश के लगभग हर कोने में, गाँव-गाँव में हड्डी वैद्य मिलते हैं, जो चौबीस घंटे में हड्डी को कच्चा जोड़ देने और मात्र 10-15 दिन में पक्का कर देने की विधियों के जानकार हैं। बुरी से बुरी तरह टूटी हड्डियों, जिन्हें जोडऩे में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को चार-पाँच लाख रुपये खर्च करने के बाद भी 60-90 दिन लगते हैं, वे केवल 15-20 दिनों में जोड़ देते हैं और वह भी लगभग नि:शुल्क अथवा 500-1000 रूपये जैसे मामुली शुल्क में। देश में कैंसर को सफलतापूर्वक ठीक करने वाले वैद्य भी बड़ी संख्या में हैं। मामूली बुखार, मलेरिया, पेट, लीवर, हृदय और मधुमेह आदि रोगों की चिकित्सा करने वाले तो और भी बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। परंतु यदि हम सरकारी व्यवस्थाओं की बात करें, तो ये सभी क्वैक यानी कि अप्रशिक्षित हैं और इन्हें चिकित्सा करने का अधिकार नहीं है।

यदि हम स्मरण करें तो केवल 50-60 वर्ष पूर्व तक गाँव-गाँव में चमाइनें हुआ करती थीं, जो आज के आशा वर्कर से कहीं अधिक प्रशिक्षित और जानकार होती थीं। यदि हमें स्मरण हो तो इन चमाइनों को नाभी-नाल के उपयोग का रहस्य भी पता होता था, जिसका पता स्टेम सेल की जानकारी के रूप में आधुनिक विज्ञान को अभी हाल में चला है। परंतु वे चमाइनें इस नाभी-नाल का अनेक प्रकार का चिकित्सकीय प्रयोग करना जानती थीं, जो कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आज भी नहीं जानता है। यह उन चमाइनों का परिश्रम ही था, कि देश में लगभग सभी प्रसव सामान्य होते थे और प्रसवोपरांत स्त्रियाँ पूरी तरह स्वस्थ हुआ करती थीं। वे छह-सात बच्चों का प्रसव करने में समर्थ होती थीं। उन चमाइनों की व्यवस्था को समाप्त करके गाइनोकोलिजस्टों पर निर्भरता का परिणाम है कि आज अधिकांश प्रसव सीजेरियन यानी पेट चीर कर किए जाने लगे हैं, जिसका सीधा परिणाम स्त्री के स्वास्थ्य पर होता है। वह इतनी कमजोर हो जाती है कि दो से अधिक प्रसव करने पर उसकी जान पर खतरा हो जाता है और यदि वह 1-2 से अधिक प्रसव नहीं करे, तब भी वह अधिक शारीरिक क्षमता वाले कामों को नहीं कर सकती।

आज भारत सरकार स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए आयुष्मान भारत चला रही है, बच्चों के स्वास्थ्य के लिए रेनबो योजना है, सुरक्षित प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों में प्रसव अनिवार्य किया गया है, और उसके लिए प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। परंतु दुखद यह है कि इन सारी व्यवस्थाओं में देश की वह मौलिक तथा स्थानीय व्यवस्थाओं का कोई स्थान नहीं है। उन व्यवस्थाओं को नीम हकीम, झोलाछाप, क्वैक, अंधविश्वास, अवैज्ञानिक आदि लांछन लगा कर समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। देश की शिक्षा व्यवस्था में भारत की चिकित्सा परंपरा को शामिल ही नहीं किया जाता। जीवविज्ञान, पादप विज्ञान से लेकर शरीर रचनाशास्त्र तक सभी में केवल यूरोप की पिछले 300 वर्षों की उपलब्धियों के इतिहास को ही पढ़ाया जाता है। फिर एलोपैथिक तंत्र को खड़ा करने के लिए सरकार हजारों करोड़ रुपये खर्च करती है। इसके बाद भी परिणाम होता है कि एक अनजानी सी बीमारी से केवल मुजफ्फरपुर में 200 से अधिक बच्चों की मौत हो जाती है। यह इस चिकित्सा व्यवस्था का सच है।

यह हमें मान लेना चाहिए कि सरकार की स्वास्थ्य नीति में जबतक देश की देशज स्वास्थ्य परंपराओं को संरक्षण, आयुर्वेद का समुचित स्थान और स्थानीय परंपरागत वैद्यों के संजाल को स्वीकृति नहीं मिलती, वह स्वास्थ्य नीति केवल और केवल चिकित्सा के व्यवसाय को ही बढ़ावा देगी और चिकित्सा के अंधविश्वास को ही फैलाएगी, जिससे और चाहे जो भी हो, लोगों को स्वास्थ्य तो नहीं ही मिल पाएगा। आज आवश्यकता यह है कि

1. सरकार अपनी स्वास्थ्य नीति में केवल एलोपैथ पर बल देना बंद करे।
2. एलोपैथ के बराबर ही आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पर व्यय करना प्रारंभ करे।
3. सरकार स्वास्थ्य सेवा प्रदाता न बने। वह केवल यह सुनिश्चित करे कि लोगों को स्वास्थ्य नि:शुल्क मिले।
4. स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा नि:शुल्क होनी चाहिए। आज मेडिकल की पढ़ाई देश की सबसे मंहगी पढ़ाई है। इसमें 30 लाख से लेकर एक-डेढ़ करोड़ रुपये तक खर्च होते हैं। स्वाभाविक ही है कि इतना शुल्क देकर पढऩे वाला व्यक्ति समाज की सेवा नहीं कर सकता।
5. आधुनिक जाँच उपकरणों की बजाय परंपरागत नाड़ी विज्ञान, प्रकृति परीक्षण आदि देशज निदान उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए।
उपाय और भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर सरकार की स्वास्थ्य नीति में देशज चिकित्सा परंपराएं, देशज चिकित्सा पद्धतियों और स्थानीय परंपरागत चिकित्सकों को स्थान दिए बिना जो भी नीति बनेगी, वह केवल बाजार को ही बढ़ावा देगी। बाजार कभी भी स्वास्थ्य को नहीं बढ़ाता, बीमारियों से ही बाजार बढ़ता है। इसलिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बाजार को बढ़ावा देने वाली कोई भी स्वास्थ्य नीति अंतत: देश को बीमार ही करेगी, चाहे वह आयुष्मान भारत हो, या रेनबो योजना हो, या राष्ट्रीय पोषाहार मिशन हो या फिर जननी सुरक्षा योजना आदि कोई भी योजना हो।