कैसा हो सशक्त नेतृत्व ?

कैसा हो सशक्त नेतृत्व ?

कैसा हो सशक्त नेतृत्व ?

राधाकृष्णन पिल्लै
लेखक कौटिलीय अर्थशास्त्र के विद्वान हैं।
नेतृत्व के मौजूदा परिदृश्य में, हम नैतिकता की कमी पाते हैं। भले ही आधुनिक विचारकों ने सुशासन का एक मूलभूत ढांचा विकसित किया है, कई लोग प्रश्न करते हैं कि इसमें एक वास्तविक व्यावहारिक विचार के बजाय एक अवधारणा ही है। प्रस्तुत लेख कौटिल्य अर्थशास्त्रा पर आधारित है, जो ईसा पूर्व चौथी सदी में कौटिल्य द्वारा लिखा गया था, जिन्हें विष्णुगुप्त भी कहा जाता है, और लोकप्रिय तौर पर चाणक्य के रूप में जाना जाता है। विभिन्न विद्वान, शिक्षाविद, शोधकर्ता, विचारक और प्रबंधन विशेषज्ञ उनका उल्लेख विश्व के सर्वप्रथम लीडर, गुरु और साम्राज्य निर्माता के रूप में करते हैं।
हम अर्थशास्त्रा की जड़ें ऋग्वेद में देख सकते हैं (नायर जी.)। अर्थशास्त्रा मुख्य रूप से अर्थशास्त्रा, राजनीति या शासन कला और दंड विचार से संबंधित है, इसलिए इसे दंडनीति भी कहा जाता है। अर्थशास्त्रा एक विशुद्ध तर्क, आन्वीक्षिकी (1.2.1) पर आधारित अधिकरण है। हमारी अधिकांश प्राचीन भारतीय पुस्तकें, अधिकरण लेखन से पहले एक देवता के आह्वान के साथ शुरू होती हैं, जो ज्यादातर मामलों में बाधाओं को दूर करने वाले गणेश और ज्ञान की देवी सरस्वती होती हैं। लेकिन इस अधिकरण में हम पाते हैं कि कौटिल्य, जिसे विष्णुगुप्त के रूप में भी जाना जाता है, ने शुक्राचार्य और बृहस्पति का आह्वान करके शुरूआत की है। ओम् नमः शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ।।
इसमें दो महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि निहित हैं, जिन्हें हम देख सकते हैं। पहला यह कि वह असुरों और देवताओं के दो महान आचार्यों (गुरुओं) का आह्वान करते हैं। हम पुराणों में पाते हैं कि असुर और देवता शत्राु थे, इसलिए उनके गुरुओं के भी अलग-अलग दृष्टिकोण रहे होंगे। इसका अर्थ होता है कि कौटिल्य ने किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले दोनों भिन्न चरम दृष्टिकोणों पर विचार किया है। दूसरे, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हम पाते हैं कि अधिकरण पूरी तरह से तार्किक विचार-विमर्श पर आधारित है, जिसमें अलग अलग दृष्टिकोणों को ध्यान में लिया गया है।
हालांकि यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि यह लेखक के दृष्टिकोण से किया गया सामान्य वर्गीकरण है। हम एक अधिकरण में शामिल क्षेत्रों को अन्य अधिकरण से भी सीख सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम न केवल पहले अधिकरण (विनयाधिकारिक) से नेतृत्व के मूलभूत तत्त्व सीख सकते हैं, बल्कि दूसरे, 8वें और 10वें अधिकरण से भी सीख सकते हैं।
हम पाते हैं कि कौटिल्य अर्थशास्त्रा में विभिन्न विशेष विज्ञानों का वर्णन करते हैं, जिनमें रत्नविज्ञान, आयुर्वेद, वास्तुकला आदि हैं। यह वाकई ध्यान देने योग्य दिलचस्प बात है कि इस प्रक्रिया में हम कौटिल्य के मस्तिष्क के करीब आ जाते हैं, जो हमें एक मास्टर माइंड प्रतीत होता है जो एक ही अधिकरण के भीतर इतने सारे अलग अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञ हो सकता है।
एक और रोचक रहस्योद्घाटन यह होता है कि कौटिल्य का अर्थशास्त्रा प्रथम अर्थशास्त्रा नहीं है। बाद में किए गए लेखन के इनेक उद्धरणों और संदर्भों से हमें पता चलता है कि कौटिल्य से पहले अर्थशास्त्रा के कम से कम चार अलग-अलग विचार केन्द्र और तेरह व्यक्तिगत शिक्षक हो चुके थे (रंगराजन, पृ. 16)। सभी अधिकरणों में वह इन विभिन्न आचार्यों के संदर्भ देते हैं, जिनमें अन्य के अलावा भारद्वाज, विशालाक्ष, पाराशर, पिशून और कौणपदांत शामिल हैं। कौटिल्य की महानता इस बात में है कि उन्होंने अपने अर्थशास्त्रा में निहित सिद्धांतों को इतना प्रयोग योग्य बनाया था कि संभवतः पिछले अर्थशास्त्रा समय के साथ लुप्त हो गए। यह तथ्य कि लगभग 2400 वर्ष बाद यह अधिकरण हमारी पीढ़ी के सामने तक आई है, यह दर्शाता है कि कौटिल्य ने प्रत्येक अवधारणा को विस्तृत ढंग से और वास्तव में सुघड़ बनाया था, तभी वह समय की कसौटी को पार कर सका। यह कौटिल्य की दूरदर्शिता को दर्शाता है। उन्होंने मनुष्य के मस्तिष्क के उस मनोविज्ञान पर काम किया है, जो समय के साथ कभी नहीं बदलता है।
प्रथम अधिकरण, जो कि प्रशिक्षण के विषय से संबंधित है, अर्थशास्त्रा में निहित प्रबंधन पहलुओं की नींव और मूलभूत बातों के रूप में लिया गया है। इसमें 21 अध्यायों और 18 वर्गों में विभाजित 500 सूत्रा हैं। किसी भी अच्छी प्रबंधन प्रणाली की भांति, अधिकरण की शुरुआत यह परिभाषित करने से होती है कि वह किन विषयों का वर्णन करने जा रही है। कौटिल्य हमें पहले ही बता देते हैं कि आने वाले अध्यायों में क्या पढ़ाया जानेवाला है। वह चाहते हैं कि छात्रों को पता हो कि वे क्या सीखने जा रहे हैं। यह कार्य शुरुआत में ही अर्थशास्त्रा का एक मूलभूत ढांचा पेश करके किया गया है, जिसके साथ ही अनुभागों और अधिकरणों की अनुक्रमणिका और विज्ञानों की (अध्याय 1 से 4) अनुक्रमणिका दी गई है।
अगला महत्त्वपूर्ण पहलू एक नेता के प्रशिक्षण से संबंधित है। स्कूलों और कॉलेजों में सिद्धांत सीखने मात्रा की आज की शिक्षा प्रणाली के विपरीत, कौटिल्य गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने की अपनी अधिक परंपरागत ढंग से शुरू होते हैं, जिसमें जानकार और अनुभवी व्यक्तियों के तहत शिक्षा ग्रहण की जाती है। इसी कारण, अगले अध्याय का शीर्षक है- विद्या संयोग (बड़ों के साथ साहचर्य)। इस बिंदु पर हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि हमें जो भी ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता है, उसे सिद्धांत मात्रा से नहीं सीखा जा सकता है। यह ज्ञान केवल उन लोगों की सावधान टिप्पणियों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जो उस विज्ञान के क्षेत्रा में जानकार हैं। यह नेतृत्व कोचिंग या गुरु-संरक्षण की वह अवधारणा है जिसे हम आज के परिदृश्य में देखते हैं।
आमतौर पर चाणक्य के रूप में जाने जाने वाले कौटिल्य की आम तौर पर कई लोगों द्वारा एक बहुत चालाक व्यक्ति के तौर पर आलोचना की गई है। इतिहासकारों ने भी उनकी तुलना प्रिंस के लेखक मैकियावेली से की है, जिसमें ऐसी विधियां हैं जो अधार्मिक या अन्यायपूर्ण लग सकती हैं। हालांकि इस तुलना को उचित नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि कौटिल्य आत्मनियंत्राण और शत्राु पर जीत के उचित तरीकों पर बहुत ज्यादा जोर देते हैं। इंद्रियजय शीर्षक वाला अगला छठा अध्याय कौटिल्य का एक पूरी तरह भिन्न पहलू सामने लाता है, आम तौर पर जिसकी अनदेखी कौटिल्य के अर्थशास्त्रा की कई वर्तमान व्याख्याओं में कर दी जाती है। इस अध्याय में वह 12 सूत्रों में विस्तार से बताते हैं कि काम, क्रोध, लोभ,मान, मद और हर्ष यानी वासना, क्रोध, अभिमान, अहंकार और मूर्खता को त्यागकर इंद्रियों पर नियंत्राण रखना कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने उन विभिन्न राजाओं के उदाहरण भी दिए हैं, जो ऐन्द्रिक सुखों में लिप्त होने पर नष्ट हो गए। अंत में, 12 वें सूत्रा में वह राजा जमदग्नि और राजा अम्बरीष, जो अपनी इंद्रियों को वश में रखने के कारण लंबे समय तक पृथ्वी का आनंद ले सके, का उद्धरण देते हुए निष्कर्ष देते हैं। इस कारण कौटिल्य की पहली शिक्षा यह है कि आप बाहरी शत्राुओं पर विजय प्राप्त करने से पहले आंतरिक शत्राुओं पर विजय प्राप्त करें।
इस विचार पर आगे अगले सातवें अध्याय के खंड 3 में चर्चा की गई है, जिसमें राजा-ऋष्यि के विषय को लिया गया है। छह शत्राुओं के समूह को निकाल बाहर करके उसे (राजा को) इंद्रियों पर नियंत्राण प्राप्त करना चाहिए, बुजुर्गों के साहचर्य से अपनी बुद्धि को समृद्ध करना चाहिए, जासूसों के माध्यम से सतर्क नजर रखना चाहिए, (ऊर्जावान) गतिविधियों द्वारा सुरक्षा और भलाई प्राप्त करना चाहिए, (अपने ही) कर्तव्यों की पूर्ति करके (प्रजा से) उनके विशेष कर्तव्यों का पालन बनाए रखना चाहिए, विज्ञान में अनुदेशों (की प्राप्ति) द्वारा अनुशासन प्राप्त करना चाहिए, जिसमें भौतिक लाभ हो, उससे जुड़कर लोकप्रियता प्राप्त करना चाहिए और जो लाभप्रद हो, वैसा करके (उचित) व्यवहार बनाए रखना चाहिए। (1.7.1) यहां हम देखते हैं कि कौटिल्य के लिए एक राजा ऋषि ही आदर्श राजा या आदर्श नेता है। बिल्कुल शुरुआत में ही उसका वर्णन करके उन्होंने स्पष्ट रूप से हमारे सामने स्थापित कर दिया है कि एक आदर्श राजा से क्या अपेक्षा की जानी चाहिए। बाद के अध्याय में ऊपर वर्णित सूत्रा के सभी विवरणों को समझाया गया है।
धर्म, अर्थ और काम के तीन पुरुषार्थों में से कौटिल्य अर्थ को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हैं। कौटिल्य कहते हैं- अकेला भौतिक कल्याण ही सर्वाेच्च है, क्योंकि आध्यात्मिक कल्याण और कामुक सुख भौतिक कल्याण पर निर्भर करते हैं (1.7.6-7)। यह चीज कौटिल्य को अन्य विचारकों से भिन्न बनाती है। उन्होंने सांसारिक जीवन में सफलता के लिए अर्थ की नींव पर जोर दिया है। इस कारण, उनकी अधिकरण का नाम अर्थशास्त्रा उचित ही है। यह,नए लोगों को, विशेष रूप से धार्मिक पृष्ठभूमि वालों को थोड़ा भ्रमित करने वाला लग सकता है। इसका अर्थ है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में विशेष रूप से शासकों को संबोधित किया गया है, न कि साधारण मनुष्यों को।
यह कोई धर्मशास्त्रा नहीं, बल्कि अर्थशास्त्रा है। सबसे बढ़कर, एक राजा का प्राथमिक दायित्व अपनी प्रजा का भौतिक और वस्तुनिष्ठ कल्याण बनाए रखना है। एक सुदृढ़ भौतिक नींव (अर्थ) काम और धर्म को प्राप्त करना आसान कर देगी।
अमात्यों (राजा के करीबी) की नियुक्ति नेतृत्व का अगला महत्त्वपूर्ण पहलू है(1.8)। इसके बाद मंत्रियों और पुरोहितों की नियुक्ति की जाती है। सभी तीनों का कर्तव्य विभिन्न मामलों पर राजा को सलाह देना और अच्छे और बुरे समय में उसके साथ रहना है। इसलिए उनके चयन की प्रक्रिया पर बहुत सावधानी से विचार किया गया है। इसके बाद गुप्त परीक्षण के माध्यम से उनकी ईमानदारी का अन्वेषण किया जाता है(1.10)। हम इसे सीधे आज के कॉरपोरेट जगत से जोड़ सकते हैं, जिसमें किसी संगठन के विभिन्न कार्यों के लिए प्रबंधक आवश्यक होते हैं। उनका चयन और नियुक्ति, प्रबंधन का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है। आज,मानव संसाधन विभाग (एचआरडी) का महत्त्वपूर्ण कार्य सक्षम प्रबंधकों की भर्तीकरना होता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्रा में राजा के प्रति उनकी स्वामिभक्ति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न परीक्षणों का सुझाव दिया गया है।
नेतृत्व की अगली प्रक्रिया के तौर पर कौटिल्य एक खुफिया नेटवर्क का निर्माण करते हैं। खुफिया सेवा में व्यक्तियों की नियुक्ति और गुप्तचरों के एक प्रतिष्ठान के निर्माण को खंड सात में विस्तार से बताया गया है। वह सुझाव देते हैं कि खुफिया सेवा में ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति, जो अच्छे छात्रा रहे हों, आत्मत्यागी भिक्षु जैसे हों, सूरत से गृहस्थ लगते हों, सूरत से व्यापारी लगते हों, प्रतीयमान तपस्वी हों, गुप्त एजेंट हों, बहादुर हों, जहरखुरानी करने वाले हों, और अन्य लोगों के अलावा भीख मांगनेवाली साध्वी हों (1.11.1)। खंड आठ में उन्होंने गुप्तचरों के लिए भी नियमों को निर्धारित किया है। फिर इन जासूसों और खुफियाकर्मियों को नागरिकों और ग्रामीण लोगों पर नजर रखने के लिए तैनात किया जाता है। उन्हें अपने ही क्षेत्रा में पथभ्रष्ट किए जा सकने योग्य और पथभ्रष्ट न किए जा सकने योग्य लोगों पर नजर रखनी होती है (खंड नौ)। इसके बाद यह चर्चा की गई है कि कैसे शत्राु के क्षेत्रा में पथभ्रष्ट किए जा सकने योग्य और पथभ्रष्ट न किए जा सकने योग्य पक्षों का दिल जीता जाए (खंड10)।
किसी भी संगठन के नेता को एक संगठन चलाते हुए उच्च मानकों को बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए। यदि राजा ऊर्जावान है, तो उसकी प्रजा भी समान रूप से ऊर्जावान होगी। यदि वह मंदगामी (और अपने कर्तव्यों का पालन करने में आलसी) होगा, तो उसकी प्रजा भी आलसी हो जाएगी, और इस प्रकार उसी की दौलत खा जाएगी। इसके अलावा, एक आलसी राजा आसानी से शत्राुओं के हाथों पराजित हो जाएगा। इसलिए खुद राजा को हमेशा ऊर्जावान होना चाहिए (1.19.1-5)। कौटिल्य राजा के लिए समय प्रबंधन के सिद्धांतों का वर्णन करते हैं (1.19.7-25)। राजा को एक खुले द्वार की नीति का पालन करने और मंदिर के देवताओं, आश्रमों, विधर्मियों, वेदों के विद्वान ब्राह्मणों, गौशालाओं और पवित्रा स्थानों, नाबालिगों, वृद्धों, बीमारों, व्यथितों और असहायों और महिलाओं के मामलों में शामिल होने में सक्षम होना चाहिए(1.19.26-29)। इस प्रकार सदैव सक्रिय रहकर, राजा को भौतिक कल्याण (अर्थ) का प्रबंधन करना चाहिए। भौतिक कल्याण का मूल सक्रियता में है, इससे विपरीत व्यवहार भौतिक आपदा लाता है। सक्रियता के अभाव में, उस सबका विनाश निश्चित है, जो पहले प्राप्त किया जा चुका है, और जो अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। सक्रियता से पुरस्कार प्राप्त किया जाता है, और व्यक्ति धन की भी बहुलता सुनिश्चित कर लेता है (1.19.35-36)।
इस प्रकार नेतृत्व के मूलभूत सिद्धांत अर्थशास्त्रा के विनयाधिकारिकम् शीर्षक वाले पहले अधिकरण में शामिल किए गए हैं, जो कि प्रशिक्षण के विषय से संबंधित हैं। एक अच्छे राजा के लिए नींव की स्थापना करने के बाद, अर्थशास्त्रा की दूसरी अधिकरण अध्यक्ष प्रचार, विभागों के प्रमुखों की गतिविधियां, देश के अर्थशास्त्रा के बारे में बात करती है। कुल 36 अध्यायों वाला यह अधिकरण एक अर्थव्यवस्था के समुचित कामकाज के तहत आने वाले कई क्षेत्रों पर विस्तार से चर्चा करता है। विस्तार से बताए गए कुछ विषय हैं- राजस्व वसूली की स्थापना, रिकॉर्ड्स, लेखा और लेखा परीक्षा कार्यालय, खदानों और कारखानों की शुरुआत, ग्रामीण इलाकों का बंदोबस्त, दुर्ग निर्माण, विभिन्न विभागीय प्रमुखों की नियुक्ति और जिम्मेदारियां और अधिकारियों का निरीक्षण। मुख्य आर्थिक संसाधनों में कृषि,पशु-पालन और व्यापार होते थे। उनके माध्यम से, खजाने और सेना के उपयोग द्वारा,राजा अपने पक्ष को और साथ ही शत्राु केपक्ष को अपने आधिपत्य में लाता है। एक अच्छी अर्थव्यवस्था का मूल उद्देश्य उन चीजों का अधिग्रहण है, जो आपके पास नहीं हैं, उन चीजों का संरक्षण करना है, जो आपके पास हैं, संरक्षित चीजों की वृद्धि करना और उन्हें एक योग्य प्राप्तकर्ता को देना है। सांसारिक जीवन का व्यवस्थित संचालन इस पर निर्भर है(1.4.1-4)।
कौटिल्य का अर्थशास्त्रा एक विशुद्ध तर्क की अधिकरण है। यह विभिन्न विषयों को सीधे और पैनी दृष्टि से संबोधित करती है। वर्तमान लेख में नेतृत्व और प्रबंधन के पहलुओं को, वर्तमान परिदृश्य के संदर्भ में उन्हें जैसा समझा जाता है, सामने रखने का प्रयास किया गया है। सावधानी से विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि अर्थशास्त्रा की कई अवधारणाएं ऐसी हैं, जिन्हें हम आज की पीढ़ी में लागू कर सकते हैं। इससे हमें कौटिल्य के महान मस्तिष्क में गहराई से उतरने और उसको समझने का भी एक अवसर मिलता है। कौटिल्य नेतृत्व के कुछ ऐसे सिद्धांतों को संबोधित करते हैं, जो सनातन हैं और समय के साथ नहीं बदलते हैं। समय के साथ हम समझ पाते हैं कि नेतृत्व सिर्फ एक अकादमिक विषय नहीं है, बल्कि यह एक मनःस्थिति है, जो इंद्रियों के नियंत्राण, बड़ों के साहचर्य, उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन और समाज के उच्चतर कल्याण के एक व्यापक लक्ष्य के साथ सावधानीपूर्वक विकसित होती है। अधिकरण का गहरा अध्ययन उन नए क्षेत्रों को सामने लाएगा, जो हमारी पीढ़ी के लिए अज्ञात हैं।