कैंसर को रोकना ही होगी अनंत कुमार को सच्ची श्रद्धांजली

भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता और भारत सरकार में मंत्री रहे अनंत कुमार का कैंसर के कारण देहांत हो गया। अनंत कुमार की आयु केवल 59 वर्ष ही थी। राजनीति के लिए तो यह आयु युवा जैसी ही मानी जाती है। कहा जा सकता है कि युवावस्था में ही अनंत कुमार कैंसर के कारण काल के गाल में समा गए। अनंत कुमार कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिसे कैंसर ने लील लिया हो। मनोहर पर्रिकर, इरफान खान आदि अनेक सार्वजनिक जीवन की हस्तियां कैंसर के पीडि़त हैं। आम आदमी तो सैंकड़ों-हजारों की संख्या में कैंसर के शिकार हो रहे हैं। प्रश्न उठता है कि क्या हमारी सरकार अब भी इसके प्रति सचेत होगी?
सोचा जा सकता है कि भला कैंसर के फैलने से सरकार का क्या लेना-देना। परंतु लेना-देना है और काफी अधिक है। कैंसर होने का सबसे बड़ा कारण है भोजन के माध्यम से शरीर में जाने वाले जहरीले रसायन जो कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के कारण अनाज, फल और सब्जियों में पहुँचते हैं। सरकार रासायनिक खादों और कीटनाशकों को लगभग 80 हजार करोड़ का अनुदान देती है। प्रकारांतर से यह धन कैंसर के प्रसार पर ही तो खर्च किया जा रहा है। अनाज अधिक पैदा हो, यह तो आवश्यक है, परंतु वह अनाज विषमुक्त और स्वास्थ्यवर्धक हो, यह भी उतना ही आवश्यक है। दुर्भाग्यवश हमारी सरकार केवल पहली प्राथमिकता पर ही ध्यान दे रही है। इसकी परिणाम हो रहा है कि देश में बड़ी संख्या में कैंसर के रोगी बढ़ रहे हैं।
इसी प्रकार खाद्य प्रसंस्करण में रसायनों का प्रयोग बड़े भारी परिमाण में होता है। यह देखना सरकार का काम है कि रसायनयुक्त प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ न्यूनतम बनाए जाएं। यदि बनाए भी जाएं तो उनमें न्यूनतम रसायनों का प्रयोग हो। वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि किसी भी प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ के पैकेट या डब्बे को उठाएं तो उसमें 20-30 प्रतिशत तक रसायन मिले होते हैं। ऐसे में उनका सेवन करने वाले लोगों को कैंसर होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। यह तो सरकार के खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय का काम है कि वह रसायनमुक्त प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को सुनिश्चित करे।
कैंसर होने का एक और बड़ा कारण प्रदूषण भी है। जल और वायु प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में जहर हमारे शरीर में जाता रहता है और हमें पता भी नहीं चलता। फिर एक दिन कैंसर होने पर हम समझ भी नहीं पाते कि आखिर यह हमें हुआ कैसे? जल प्रदूषण के लिए प्लास्टिक और रासायनिक कचड़ा सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। इसे देखना भी सरकार का ही काम है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तो है, परंतु उसका कोई परिणाम दिखता नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिक सक्षमता से काम कर सके, इसकी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। यदि आवश्यकता हो तो इसके लिए उसे चुनाव आयोग की भांति एक स्वायत्त संस्था भी बनाना चाहिए।
इसलिए स्व. अनंत कुमार को सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि सरकार पर दबाव बनाया जाए कि सब प्रकार के प्रदूषण से निपटने को अपनी प्राथमिकता बनाए। रासायनिक खाद और कीटनाशक वाली खेती को दी जाने वाली 80 हजार करोड़ के अनुदान को क्रमश: बन्द कर गौ आधारित खेती को आर्थिक सहायता और बढ़ावा दे। खाने पीने की चीज़ों में मिलावट को ले कर गम्भीर हो और जितनी मदद सरकार ऐलोपैथी को दे रही है, कम से कम उतनी ही आयुर्वेद को भी दे।