कृषि से ही विश्वगुरु बनेगा भारत

कृषि से ही विश्वगुरु बनेगा भारत

हमारे मनीषियों ने कृषि में पशुधन को भी काफी महत्व दिया था। कृषि कार्य में पशुधन का उपयोग खेतों को जोतना, बीज बोना तथा खेतों से फसल की ढुलाई आदि में होता था। इसी कारण हमारे यहां पशुधन के पूजन का विधान रहा है। दीपावली के पश्चात् मनाये जानी वाली गोधन पूजा उसका ही स्वरूप है। गोपाष्टमी पर गौपूजा का विधान भी इसका ही अंग है।
ऋग्वेद तथा अथर्ववेद की अनेक ऋचाओं में वर्षा, पशुधन के महत्व तथा छह ऋतुओं का उल्लेख मिलता है। धरती की उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद का उपयोग वैदिक काल में प्रचलित था। जौ के भूसे, विभिन्न पौधों एवं उनकी पत्तियों तथा गोबर से बनी खाद का महत्व का वर्णन वेदों में मिलता है। अथर्ववेद ने इसका विशद वर्णन किया गया है।
प्राचीन भारत में कृषि के विषय में अनेक महत्वपूर्ण अनुसंधान किये गये हैं। बीज, मिट्टी के गुण-दोष, बुवाई, कटाई, फसल की सुरक्षा आदि के विषय में अध्ययन होता रहा है। साथ ही उन्नत बीजों का भी अनुसंधान होता रहा है। ऋग्वेद में पौधों में अनाज के दानों की उत्पत्ति में प्रकाश की भूमिका का भी उल्लेख मिलता है। प्राचीन भारत में 16 प्रकार के विषैले कीटों का उल्लेख मिलता है जो मनुष्यों, पशुओं तथा फसलों को हानि पहुचाते हैं।
भारतीय पद्धति में कृषि तथा पशु एक दूसरे के पूरक रहे हैं। कृषि में पशुओं के उपयोग का वैज्ञानिक कारण रहा है। प्रसिद्ध कवि घाघ ने कृषि के विषय में जो रचनाएं की है, वे बड़ी ही वैज्ञानिक हैं और आज भी उपयोगी हैं। गाय तथा बैल की पहचान किस प्रकार की जाय, इसके वर्णन के साथ उन्होंने अनाज की बुवाई में बीज बोने की मात्रा का भी कहावतों के रूप वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। घाघ कहते हैं-
जौ, गेहूं बोवे सात पसेर, मटर के विगहा साढे सेर,
बोवे चना पसेरी तीन, दे सेर विगहा जोन्हाई कीन।।
भारत में खेती को सर्वोत्तम कार्य माना गया था। कृषि कार्य आज भी स्वाभिमान का प्रतीक है। घाघ ने कहा है। उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। आधुनिक कृषि उपकरणों ने जहां कृषि कार्य को सुगम किया है, वहीं कृषि भूमि की उर्वराशक्ति को नष्ट किया है तथा कृषक को कर्ज के अन्धकूप में डालने का काम किया है। कृषि जो कभी स्वाभिमानपूर्ण व्यवसाय माना जाता था, उसे हीन व्यवसाय बना दिया गया है। परिणामत: आज शिक्षित वर्ग खेती के काम से दूर भागता है। खेती अनपढ़ और गंवारों का व्यवसाय माना जाने लगा है। इस समस्या से कृषि को बाहर निकालने की आवश्यकता है। इसका समाधान हम सबको मिलकर खोजना है। इसके लिए कृषि के अतीत को स्मरण कराने की आवश्यकता है। भारतीय गौरव नौकरी में नहीं अपितु कृषि में है। कृषक अन्नदाता होता है, अन्नदाता का स्थान विश्व में सर्वोपरि होता है। यह स्वाभिमान कृषक में उत्पन्न कराने की आवश्यकता है। भारत को विश्वगुरु बनाने का मार्ग भी यही है।