कुम्भ मेला फिर बने वैचारिक महापर्व

गुंजन अग्रवाल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहास के शोधार्थी हैं।


विक्रम संवत् 2075 के जाते-जाते, माघ मास में प्रयागराज में अर्धकुम्भ का आयोजन हो रहा है। अपने देश में प्रत्येक छह वर्ष पर हरिद्वार तथा प्रयागराज में अर्धकुम्भ; 12-12 वर्ष पर हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में कुम्भ तथा 144 वर्ष पर प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन अति प्राचीन काल से हो रहा है। यह पर्व हमें हजारों वर्ष पुरानी स्मृति और परम्परा से जोड़ता है।
कुम्भ का तात्पर्य है गंगा, गंगा-यमुना संगम, शिप्रा अथवा गोदावरी के तट पर प्रत्येक 6 अथवा 12 वर्ष पर, विशेष नक्षत्रीय स्थिति में लगनेवाला श्रद्धालुओं का विशाल जमघट (मेला)। देशभर से करोड़ों साधु-सन्त और जनसामान्य यहाँ स्नान करने एकत्र होते हैं तथा पूरे एक मास तक कल्पवास करते हैं। इस दौरान स्नान, ध्यान, हवन, पूजा-पाठ, सत्संग, भजन, आदि के कार्यक्रम चलते रहते हैं।
कुम्भ का ज्योतिषीय आधार
कुम्भ के प्रादुर्भाव की कथा न्यूनाधिक सभी जानते हैं। संक्षेप में, भागवतपुराण (स्कन्ध 8, अध्याय 5) के अनुसार चाक्षुष-मन्वन्तर (पौराणिक कालगणनानुसार लगभग 42.89 करोड़ वर्ष पूर्व) भगवान् विष्णु का कच्छप-अवतार हुआ एवं क्षीरसागर के मन्थन से चन्द्रमा सहित 14 रत्नों की उत्पत्ति हुई। इसी समुद्र-मंथन के दौरान अमृत-कलश (कुम्भ) भी निकला, जिसे प्राप्त करने के लिए देवताओं एवम् असुरों में छीना-झपटी हुई। संकट का अनुमान करके भगवान् विष्णु ने एक योजना बनायी और स्वयं मोहिनी अवतार धारण करके देवताओं को अमृतपान कराने के लिए पंक्तिपद्ध बैठाया। वितरण के लिए अपने को प्रस्तुत करने से पूर्व मोहनीरूप विष्णु ने इन्द्र-पुत्र जयन्त को अमृत-कलश धारण करने का भार दिया। और उसकी रक्षा का दायित्व नवग्रहों में से सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति और शनि को दिया। कलश न टूटे, न फूटे, यह कार्य सूर्य को दिया गया; अमृत न छलके, न बहे, यह दायित्व चन्द्र को मिला; राक्षसों से अमृत-कुम्भ सुरक्षित रहे, इसका भार देवगुरु बृहस्पति को दिया गया; शनि का कार्य जयन्त की रक्षा करना था-
चन्द्र: प्रस्त्रवणादू रक्षां सूर्यो विस्फोटनाद्दधौ।
दैत्येभ्यश्च गुरु रक्षां सौरिर्देवेन्द्रजाद्भायत्।।
इन्हीं चारों ग्रहों से चार स्थानों पर होनेवाले कुम्भ-पर्व की कथा जुड़ी हुई है। राक्षसों से कलश की रक्षा करने के लिए ही जयन्त को चतुर्दिक् भागकर जाना पड़ा। भागने के क्रम में नासिक, उज्जैन, हरिद्वार और प्रयाग पर कुम्भ से अमृत की बूँदें छलकीं। इस घटना की स्मृति में इन 4 स्थानों पर कुम्भ-मेलों का आयोजन होता है। हरिद्वार में अमृत तब छलका जब सूर्य ने मेष राशि में तथा बृहस्पति ने कुम्भ-राशि में प्रवेश किया था-

पद्मिनी नायके मेषे कुम्भ राशि गते गुरो:।
गंगाद्वारे भवेद्योग: कुम्भ नामा तथोत्तमा:।।
प्रयाग में अमृत छलकने का समय वह था जब सूर्य मकर राशि में (मकर-संक्रान्ति) तथा बृहस्पति वृष-राशि में प्रवेश किए थे। एक अन्य गणना के अनुसार सूर्य एवं चन्द्र मकर-राशि में तथा बृहस्पति के वृष-राशि में प्रवेश करने पर, माघ मास में अमावस्या को प्रयाग में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है। यहाँ के कुम्भ को मकरस्थ कुम्भ भी कहा जाता है-
मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पतौ।
कुम्भ योगो भवेत्तत्र प्रयागे ह्यति दुलभ:॥
माघे वृषगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ।।
अमावस्यां यदा योग: कुम्भाख्यस्तीर्थनायके॥
हरिद्वार और प्रयागराज में दो कुम्भ पर्वों के बीच 6-6 वर्ष के अन्तराल में अर्धकुम्भ का भी आयोजन होता है। जनवरी-फरवरी, 2019 में माघ मास के दौरान प्रयागराज में अर्धकुम्भ का ही आयोजन हो रहा है।
जब सूर्य मेष राशि में और बृहस्पति सिंह राशि में और प्रवेश किए थे, तब उज्जैन के क्षिप्रा में अमृत छलका। इस घटना की स्मृति में उज्जैन में यहाँ प्रत्येक 12 वर्ष पर सिंहस्थ नामक कुम्भ का आयोजन होता है-
मेष राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ।
उज्जियन्यां भवेत कुम्भ: सदामुक्ति प्रदायक:॥
जब सूर्य और बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश किए थे, तब नासिक के गोदावरी में अमृत छलका। मतांतर से बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा के कर्क राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन गोदावरी-तट पर सिंहस्थ नाम से प्रसिद्ध कुम्भ का आयोजन होता है-
सिंह राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पति।
गोदावर्या भवेत कुम्भो जायते खलु मुक्तिद:॥
कर्के गुरुस्तथा भानुचन्द्रश्चन्द्रक्र्षगतस्तथा।
गोदावर्या तदा कुम्भो जायतेवनिऽमण्डले॥
नारदीयपुराण (2.66.44), शिवपुराण (1.12.22-23) एवं वाराहपुराण (1.71.47-48) और ब्रह्मपुराण में भी कुम्भ एवं अर्धकुम्भ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुम्भ पर्व हर तीन साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। कहा जाता है कि हरिद्वार के बाद कुम्भ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाये जानेवाले कुम्भ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जानेवाले कुम्भ पर्व के बीच तीन सालों का अंतर होता है।

सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकत्व का प्रतीक
कुम्भ भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। भारत और विश्वभर में फैले कोटि-कोटि हिंदू और प्रवासी भारतीय युगों-युगों से कुम्भ के माध्यम से आध्यात्मिक रूप से एकताबद्ध होते रहे हैं। किसी उत्सव के आयोजन में भारी जनसम्पर्क अभियान और अतिथियों को आमंत्रण प्रेषित किया जाता है, जबकि कुम्भ विश्व में एक ऐसा पर्व है जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता। भाषा-भेद, जाति-भेद, वर्ण-भेद, प्रांत-भेद, आयु-भेद तथा साधन-भेद से ऊपर उठकर, केवल आस्था के बल पर, करोड़ों लोग सहस्राब्दियों से केवल पञ्चाङ्ग देखकर, इस पवित्र पर्व को मनाने के लिए एकत्र होते हैं। इनमें ऊँच-नीच, छुआछूत, दलित-पूजित का कोई भेदभाव नहीं रह जाता। कुम्भ एक ऐसा विशाल पर्व है जहाँ सनातन हिन्दू संस्कृति अपने सम्पूर्ण वैभव-समृद्धि और सौन्दर्य के साथ समुपस्थित रहती है। यह आर्य संस्कृति का वृहत्तम मिलन-बिन्दु है।
एक महीने के इस आयोजन को कल्पवास भी कहा जाता है, जिसमें मेला-परिसर में स्नान-कर्म के अतिरिक्त यज्ञ, हवन, वेदमंत्रों का गान, दान, प्रवचन, सत्संग, शास्त्रीय संगीत, भक्ति-भाव के गीतों, भगवान की लीलाओं का मंचन, आध्यात्मिक कथानकों पर आधारित कार्यक्रमों, प्रार्थनाओं, धार्मिक सभाओं के आयोजन होते हैं। बड़े पैमाने पर यज्ञ होने से मेला-परिसर का वायुमण्डल अत्यन्त शुद्ध हो जाता है। कुम्भ-पर्व का एक महत्त्वपूर्ण भाग निर्धनों एवं वंचितों को अन्न एवं वस्त्र का दान-कर्म है और संतों को आध्यात्मिक भाव के साथ गोदान किया जाता है।
देश का सामान्य जन कुम्भ को महान् अवसर के रूप में देखता है और इस दौरान कल्पवास करना अपना परम सौभाग्य समझता है। देश के कोने-कोने से लाखों-करोड़ों लोग पैदल, वाहन से चलकर कुम्भ में पहुँचते हैं, नदी में डुबकी लगाते हैं, अमृत की अनुभूति करते हैं। कुम्भ-मेले (कल्पवास) के दौरान क्या राजा, क्या रंक, क्या साधु-संन्यासी, सभी बालुकामयी सर्द भूमि पर शयन करते हैं। एक समय का भोजन एवं तीनों समय स्नान-पूजा तथा यज्ञ, हवन और भगवद्भजन करते हैं और तमाम कठिनाइयाँ भी सहते हैं; क्योंकि आस्था समस्त कठिनाइयों पर सर्वोपरि रहती है –
सहस्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नान शतानि च।
वैशाखे नर्मदा कोटि: कुम्भस्नानेन तत्फलम्॥
अर्थात् कार्तिक मास में एक सहस्र और माघ मास में सौ बार स्नान से तथा वैशाख में नर्मदा में एक करोड़ बार स्नान करने से जो पुण्य मिलता है, वह एक कुंभस्नान करने से मिल जाता है।
अश्वमेध सहस्राणि वाजपेय शतानि च।
लक्षप्रदक्षिणा भूमे: कुम्भस्नानेन तत्फलम्॥
अर्थात् एक हजार अश्वमेध यज्ञ, एक सौ वाजपेय यज्ञ करने का तथा एक एक लाख भूमि की परिक्रमा करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह एक बार कुंभ पर्व का स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।
सनातन-धर्म के सम्प्रदायों का अपूर्व संगम:
कुम्भ में सभी सम्प्रदायों के ऋषि-मुनि, योगी, तपस्वी, साधु-संत खुले मन से सम्मिलित होकर अपने को कृतार्थ करते हैं। कुम्भ पर्व मुख्यत: साधु-संन्यासियों का ही माना जाता है। प्राचीन काल से आत्मसाक्षात्कार रूपी अमृत की प्राप्ति के लिए साधु-सन्त कुम्भ पर्व पर एकत्र होते रहे हैं। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य (509-477 ई.पू.) द्वारा स्थापित शांकर-मठ तथा दशनामी नागा-संन्यासी इस पर्व पर अनिवार्य रूप से एकत्र होते हैं। देश के किसी भी कोने में रहनेवाले, हिमालय की कंदराओं तक में एकांत साधना करनेवाले साधु-संन्यासी भी कुम्भ के अवसर पर स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं। नदी-तट पर एकत्र होकर अध्यात्म साधना, धर्मचर्या तथा धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विचार-विमर्श करना, तत्पश्चात् अपने विचारों को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए निकल पडऩे की परम्परा रही है। यह परम्परा आज भी कायम है। आज भी साधु-संन्यासी अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय कुम्भ के अवसर पर लेते हैं और नये शिष्यों को भी इसी अवसर पर सन्त-समाज में सम्मिलित किया जाता है। महामण्डलेश्वरों का चयन भी इसी समय पर होता है। संत एवं साधु धर्म, दर्शन, शास्त्रों के सिद्धान्तों पर वाद-विवाद एवं विमर्श करते हैं। आगामी 12 वर्षों के लिए हिंदू-धर्म का कैलेण्डर, अखाड़ों के कार्यक्रम और समाज में घटनेवाले घटनाक्रम पर चिन्तन भी करते हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् की मार्गदर्शी बैठकें, शंकराचार्यों के भविष्य के कार्यक्रम, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के टीकाकार, प्रवचनकार, जीवन-प्रबन्धन गुरु आदि यहाँ अपनी वाणी और कर्म के द्वारा विचार-वैतरणी में गोते लगवाते हैं।
सनातन-धर्म के अंतर्गत आनेवाले श्रीवैष्णव, गौड़ीय वैष्णव, रुद्र, माध्व, सनक, वल्लभ, रामानुज, हरिदासी, स्वामीनारायण, प्रणामी, पांचरात्र, नारायणी, दशनामी, नाथ, कापालिक, लिंगायत या वीरशैव, पाशुपत, अघोर, दक्षिणाचारी, वामाचारी, सौर, शाक्त, गाणपत्य, नारसिंह, स्मार्त, रामानन्दी, श्वेताम्बर, दिगम्बर, हीनयान, महायान, वज्रयान, सिख, रामरंजा, कबीरपंथी, खालसा, अकाली, उदासी, नामधारी, निरंजनी, निरंकारी, राधास्वामी, आदि सभी मत-मतांतर को माननेवाले, कुम्भ में उत्साहपूर्वक एकत्र होते हैं। साधु-संन्यासी, सन्त-महन्त, मठाधीश-महामण्डलेश्वर, पीठेश्वर, धर्माचार्य-शंकराचार्य, अपने-अपने अखाड़ों-आश्रमों के साथ महीनेभर तक कुम्भ मेले में डेरा डाले रहते हैं और अपने-अपने अखाड़ों की भव्य शोभा यात्राएं निकालते हैं। कितने ही साधु-संत धूनी रमाते हैं, कीर्तन करते हैं, तपस्या में लीन रहते हैं। कितने ही हठयोगी, कुम्भ में आकर अपनी योग-सिद्धियों और चमत्कारों का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। विभिन्न वेशों और मुद्राओं में आए कितने साधु-संत चर्चा-कौतूहल के विषय बने रहते हैं। इस तरह कुम्भ में न केवल सनातन-धर्म की विराटता और लघु भारत की झलक दिखती है, वरन् इससे भारत की सम्पूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक एकता भी सुदृढ़ होती है।
कुम्भ के दौरान देश-विदेश से आए लाखों-करोड़ों दर्शनार्थी-श्रद्धालु मेला-परिसर का भ्रमण करते हैं और साधु-सन्तों के शिविरों में जाकर उनके सम्प्रदाय का परिचय प्राप्त करते हैं। प्रो. संगमलाल पाण्डेय के शब्दों में, विविध धर्माचार्यों के क्या सिद्धान्त हैं? इसे उनके प्रवचनों में सुना जा सकता है। उनकी क्या साधनाएँ हैं? इसे उनकी जीवनशैली एवं दिनचर्या में देखा जा सकता है। उनका क्या सांस्कृतिक अवदान है? इसे उनके संगीत-कार्यक्रम, मन्दिर-निर्माण, यज्ञभूमि-निर्माण, आदि में देखा जा सकता है। उनके ग्रंथ और गुरु कौन हैं, इसे उनके यहाँ विराजमान पुरुषों को देखकर तथा उनके अनुयायियों के स्वाध्याय को देखकर समझा जा सकता है। उनका लक्ष्य क्या है, इसको उनके सत्संग से जाना जा सकता है। वे कैसे दीक्षा देते हैं, यह उनके दीक्षा-समारोह से समझा जा सकता है। इन धर्माचार्यों अथवा साधकों की कितनी श्रेणियाँ हैं, वे कैसे अध्यात्म-जगत् में विकास करते हैं, इसे उनके साथ रहनेवाले अनेक महापुरुषों के सत्संग से जाना जा सकता है। इस प्रकार कुम्भ मेला अध्यात्म-साधना और धर्म-दर्शन का पदार्थ पाठ प्रस्तुत करता है। वह हिंदू-धर्म के उस सिद्धान्त को प्रत्यक्ष बना देता है जिसे विविधता में एकता कहा जाता है। कहना न होगा कि यदि किसी को हिंदू-धर्म को देखना हो, यदि किसी को हिंदू-भावनाओं के आदर्शों को समझना हो, तो उसे कुम्भ-पर्व का दर्शन करना चाहिये। (अमृत महाकुम्भ : जिज्ञासा-पर्व, कुम्भ-विशेषांक, स्मारिका, श्रीपथरचट्टी रामलीला कमेटी, प्रयाग, 2012, पृ. 67-69)
कुम्भ और जल-संरक्षण
भारतीय संस्कृति का विकास नदी के तटों पर हुआ है। बड़ी-बड़ी सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ नदी-तटों पर पल्लवित-पुष्पित हुई हैं। अपने देश में नदी और सरोवर के तटों पर मेलों के आयोजन होते आए हैं। प्रश्न उठता है कि नदी के किनारों को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया गया? स्नान करना एक मुख्य कारण हो सकता है जिसके साथ अध्यात्म भी जुड़ा है। कुम्भ भी उसी शाृंखला की एक कड़ी है। कुम्भ के दौरान लाखों-करोड़ों लोग एक ही समय में, एक ही जल में, एक ही भावना से इक_े होते हैं। जीवनदायिनी नदी के आसपास इतने बड़े आयोजन का कोई-न-कोई मूल प्रयोजन अवश्य रहा होगा। केवल आस्था, पुण्य-स्नान और मोक्ष-जैसी अमूर्त धारणाएँ इसका प्रयोजन नहीं हो सकतीं। हमारे पूर्वजों ने जलराशि को इतना अधिक महत्त्व इसलिए दिया कि जनसाधारण बार-बार जल के समीप जाये, उसके महत्त्व को समझे, उसकी साज-सम्भाल, देख-रेख, साफ-सफाई और सुरक्षा करे। कुम्भ स्वयं एक जल-प्रतीक है। जल को कुम्भ में संचयित किया जाता है। बिना कुम्भ या पात्र के जल को संचयित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार बिना जलतट के कुम्भ-जैसे बड़े आयोजन नहीं सम्भव हैं। इन उत्सवों के बहाने जल की महत्ता, संरक्षण और सुरक्षा का सन्देश ऋषियों ने मानवमात्र को दिया है।


वैचारिक कुम्भ का शंखनाद

कुम्भ ज्योतिषीय तथा आस्था का पर्व मात्र नहीं है। यह एक वैचारिक आयोजन भी है। समझा जाता है कि प्राचीन काल में कुम्भ मेलों के अवसर पर ही सनातन धर्म के सभी शाखाओं के लोग यहाँ एकत्र हुआ करते थे। यहाँ विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श और शास्त्रार्थ हुआ करते थे। यही कारण है कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी हरेक कुम्भ मेले में शास्त्रार्थ के लिए पाखंडखंडिनी पताका लहराया था। बाद में विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष और मुस्लिम तथा अंग्रेजों के शासनकाल में हुई अराजकता के कारण कुम्भ केवल आस्था के मेलों के रूप में बचा रहा।
पिछले कुछेक कुम्भ आयोजनों से अनेक संतों तथा संगठनों का प्रयास रहा है कि कुम्भ के प्राचीन गौरव को फिर से जीवित किया जाए और इसे वैचारिकता के महापर्व के रूप में मनाया जाए। इसके लिए कुम्भ मेलों में स्नान करने के साथ-साथ अनेक वैचारिक आयोजन भी किए जाने लगे हैं। पिछले कुम्भ में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में मंथन के नाम से पाँचदिवसीय विशाल वैचारिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
कुम्भ की लोकप्रियता से आकृष्ट होकर विगत कुछ वर्षों से बहुत-से संगठन और धर्माचार्य कुम्भ के नाम से विविध वैचारिक कार्यक्रम भी आयोजित कर रहे हैं। पिछले दिनों उज्जैन में आयोजित सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर ऐसे अनेक कार्यक्रम कुम्भ के नाम से आयोजित किए गये, जिनमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, संघ के परमपूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत, डॉ. कृष्ण गोपाल, महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि, श्रीश्री रविशंकर आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रयागराज में माघ मास के अवसर पर आयोजित होनेवाले अर्धकुम्भ से ठीक पहले, उत्तरप्रदेश सरकार के साथ मिलकर वैचारिक कुम्भ का आयोजन करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत 5 आयामों पर बड़े कार्यक्रम होंगे :
1. पर्यावरण-कुम्भ : पृथिवी और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने के लिए दिनांक 01-02 दिसम्बर, 2018 को प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पर्यावरण-कुम्भ का आयोजन होने जा रहा है। इसमें देश के सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक हिस्सा लेंगे। महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ को इस आयोजन की जिम्मेदारी दी गई है।
2. मातृशक्ति-कुम्भ : दिसम्बर महीने में वृन्दावन में आयोजित इस कुम्भ में नारी-सुरक्षा, नारी-शक्ति की चुनौतियों और विकास में बाधाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। इसमें देशभर की प्रमुख महिला बुद्धिजीवी भाग लेंगी।
3. सामाजिक समरसता-कुम्भ : सामाजिक समरसता के संवर्धन के लिए अयोध्या में द्विदिवसीय समरसता-कुम्भ का आयोजन अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या, 15-16 दिसम्बर, 2018 में होगा।
4. युवा-कुम्भ : लखनऊ में दिनांक 6-7 दिसम्बर को युवा-कुम्भ का आयोजन किया जायेगा। इसमें 21 से 46 वर्ष तक के युवा भाग लेंगे जो शैक्षणिक संस्थाओं से होंगे। बुद्धिजीवी एवं कलाकार भी इसमें शामिल होंगे।
5. सर्वसमावेशी संस्कृति कुम्भ : यह प्रयागराज में आयोजित होगा। इसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति समाज के विचारक भाग लेंगे।


प्रयाग और महर्षि भारद्वाज

प्रयागराज महर्षि भारद्वाज की तपस्थली है। प्रयाग में ही महर्षि भारद्वाज का आश्रम था वाल्मिकी रामायण में उल्लेख आता है कि राम, लक्ष्मण और सीता गंगा पार करने के उपरांत चलते-चलते गंगा-यमुना के संगमस्थल पर्याग पर श्री भारद्वाज के आश्रम में पहुंचे। महर्षि भारद्वाज अपने शिष्यों से घिरे बैठे थें राम ने अपना परिचय दिया। भारद्वाज ने उन तीनों का स्वागत किया। रात-भर वहां रहकर राम, सीता और लक्ष्मण ने श्री भारद्वाज के परामर्श के अनुसार चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान किया। राम से मिलने के लिए भरत अपनी सेना के साथ वन की ओर चले। मार्ग में मुनि भारद्वाज के आश्रम में पहुंचे। पहले भारद्वाज को शंका थी कि कहीं वे राम के अहित की कामना से तो नहीं आये हैं। जब उन्हें यह ज्ञात हो गया कि भरत तो श्रीराम को वापस लेने आए हैं तो उन्हें सेना समेत आतिथ्य स्वीकार करने को कहा।
महर्षि भारद्वाज भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आचार्यों में से एक हैं। महर्षि भारद्वाज ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा कह गये हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम रात्रि था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है। भारद्वाज के मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार कशिपा भारद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संताने मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। स्वाभाविक ही है कि वैदिक ऋषियों में महर्षि भारद्वाज का अति उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं।
भारद्वाज ने इन्द्र से व्याकरण-शास्त्र का अध्ययन किया था और उसे व्याख्या सहित अनेक ऋषियों को पढ़ाया था। ऋक्तन्त्र और ऐतरेय ब्राह्मण दोनों में इसका वर्णन है। भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद पढ़ा था, ऐसा चरक ऋषि ने लिखा है। उन्होंने इन्द्र द्वारा अग्नि तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर अनेक ग्रंथों की रचनाएँ कीं।
आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे। इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में दीर्घजीवितम पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं। चरक ऋषि ने भारद्वाज को अपरिमित आयु वाला कहा। आयुर्वेद के गहन अध्ययन के आधार पर महर्षि भारद्वाज ने आयुर्वेद-संहिता की रचना भी की थी। भारद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र का उपदेश प्राप्त किया और भारद्वाज स्मृति की रचना की। महाभारत तथा हेमाद्रि ने इसका उल्लेख किया है। पांचरात्र-भक्ति-सम्प्रदाय में प्रचलित है कि सम्प्रदाय की एक संहिता भारद्वाज-संहिता के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। महाभारत, शान्तिपर्व के अनुसार ऋषि भारद्वाज ने धनुर्वेद- पर प्रवचन किया था। वहाँ यह भी कहा गया है कि ऋषि भारद्वाज ने राजशास्त्र का प्रणयन किया था। कौटिल्य ने अपने पूर्व में हुए अर्थशास्त्र के रचनाकारों में ऋषि भारद्वाज को सम्मानसहित स्मरण किया है। ऋषि भारद्वाज ने यन्त्र सर्वस्व नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी, जोकि तकनीकी का एक उच्चस्तरीय ग्रंथ है। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने विमान-शास्त्र के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि महर्षि भारद्वाज केवल एक धर्मज्ञ ऋषि ही नहीं थे, बल्कि वे एक श्रेष्ठ विज्ञानी और इंजीनियर भी थे। उन्हें यंत्रों का काफी उच्चतम ज्ञान था। दुर्भाग्यवश प्रयाग जाने वाले तीर्थयात्री अक्सर इस बात से अनजान होते हैं कि ऐसे महान भारद्वाज का आश्रम आज भी प्रयाग में है। आवश्यकता है कि प्रदेश सरकार महर्षि भारद्वाज के आश्रम का जीर्णोद्धार करवाए औ उसे एक तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करे ताकि हमारी पीढिय़ां ज्ञान के इस प्रवाह से परिचित हो सकें।