कुमार जी जहां भी होते नुमायां होते

कुमार जी जहां भी होते नुमायां होते

सारा मालवा एक गांव है और उस गांव की कांकड़ पर सामने वाले नीले विन्ध्याचल से आये पत्थरों से बना एक ओटला है। इस ओटले को काली धरती की कोख से निकली पीली मिट्टी से सुहागिनों ने छाबा है। छाबते हुए वे गाती रही हैं-‘सुब की घड़ी म्हारे आनंदे बदावोजी राज, म्हारी देराणी जिठाणी ने उरी रे बुलावोजी राज।फिर, ‘सखी घोलूं चंदन लिपूं आंगेणो जी’ गाते हुए हरे हरे गोबर से इस ओटले को कुंआरियों ने लीपा है। सखियों ने मोतियों से चौक पुराया है क्योंकि ‘आज कंचन दन उगीयो जी।
मोतियों के चौक पर बैठे हैं- भेरू जी। भेरू जी यानि मालवा के ग्राम-देवता-शिव। भेरू जी यानि शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमलानी यानी कुमार गंधर्व। कुमार गंधर्व यानि कर्नाटक बेलगांव के सुलेभावी गांव में जन्में, बम्बई और पुणे में गाना सीखे और देवास आकर संगीत के नीले अनंत आकाश में कबीर की तरह अपना चिमटा गाड़ देने वाले हमारे भेरू लाल सिंदूर बिंदी वाले। ‘भेरू जी बालक तमारो बेस। ओ लंबा तमारा केस। ओ भवरे पटा पर मरवो मोगरो जी।’
आज साठ साल के हुए बालरूप भेरू जी, आपके लंबे लंबे बालों पर सजा मोगरा बहुत भाता है। पूजा में देर इसलिए हुई कि कुम्हार के घर से कलश और सुतार के घर से चौखट लेने गया था। भेरू जी भेरू जी। हमारी लोक धुनों की झारी से शास्त्रीय संगीत को नहला धुलाकर आपने अनहद नाद कर दिया है। भेरूस्स् जी भेरू जी। चिमटे की ताल पर गाते हमारे कनफड़े साधुओं के निरगुनी भजनों से आपने गगनमंडल गुंजा दिया है। आप हैं तो हजारों साल से गाया और जिया जा रहा मालवा फिर जी रहा है- भेरू जी ! हम निरभय निरगुण होकर आपके गुण गायेंगे। भेरू।
कुमार गंधर्व का संगीत कैसा है और शास्त्रीय संगीत में उनका क्या योगदान है, इसे चेतन करनानी, दो-तीन देशपांडे, एक ठो राहुल बारपुते और रोब जमाना चाहें तो कोई दर्जन भर अशोक वाजपेयी को पढ़ लीजिए। लेकिन तब कुछ हिस्सा ऐसा भी हो सकता है गाने वालों ने गाया, सुनने वाले को मजा नहीं आया और उसने पूछा कि क्या गाया था? तो बताया कि भैरवी! भैरवी! वाह, वाह तब तो मजा आ गया।
लेकिन सुनते समय आपको लगे कि भोर हो रही है, घंटे घडिय़ाल बज रहे हैं – अगरू गंध फैल रही है और ओस से आचमन किए मोगरे के फूल किसी के चरणों पर रख दिए गए हैं- तो मालूम हो या नहीं, जो गायी जा रही है वह भैरवी है।Kumar_gandarbh
संगीत का आनंद लेने के लिए उसका शास्त्र जानना जरूरी नहीं है। शास्त्र में से होते हुए शास्त्र से परे संगीत है- यही तो कुमार गंधर्व पचास साल से गा रहे हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान तो यही है कि शास्त्रीय गणित होते जा रहे संगीत को उन्होंने फिर कला बना दिया और इसलिए नहीं कि 1947 से 1952 तक के पांच साल में टीबी ने उनके जवान फेफड़ों में से वह ताकत निकाल दी जो लंबी तानें भरने और पंचम सुर लगाने के लिए जरूरी है। जिससे विवाह के तीन महीने बाद ही तपेदिक हो गया, उस पत्नी भानुमति को जिसने डूबती आवाज में कहा था- ‘भानु, जब तक मैं गाया करूंगा, मरूंगा नहीं’, उस कुमार गंधर्व को शास्त्रीय संगीत का पुनरूद्धार करने के लिए टीबी का मरीज होना जरूरी नहीं था। महानता क्या किसी रोग की मोहताज होती है? यह तो फितरत है। कुमार जी जहां भी होते नुमायां होते। वो समंदर में भी होते तो तूफां होते।
राहुल जी (यानी कुमार जी के जिगरी दोस्त राहुल बारपुते) ने लिखा है कि जहां कुमार 30 जनवरी 1948 को रहने आए, वहां के लोग इलाज कराने को बम्बई जाते थे। और कुमार जी बम्बई छोड़कर मालवा के छोटे से कस्बे देवास आये, जबकि उन्हें (उस समय की असाध्य बीमारी) टीबी हो गई थी। इसे राहुल जी ने कुमार जी की अपने ही बूते पर अपने कष्टों से पार पाने, फैसले करने और उन पर निश्चय से अमल करने की अद्भुत शक्ति बताया है। यह शक्ति तो उनमें खैर है ही, लेकिन कुमार जी ने यह भी कहा है कि देवास में ही मामा (कृष्णराव) मजूमदार के घर 1943 में एक बार गाने के बाद उन्हें अचानक लगा था कि अब मुझे गाना आ गया।
तो देवास कुमार जी के लिए आत्म-साक्षात्कार की जगह थी। इसलिए टीबी से जूझने के लिए उनका वहां आना एक माने में संकट की घड़ी में अपने को पाने की इच्छा थी। बम्बई की दवाइयों से ज्यादा शायद वे अपने साक्षात्कार से अपनी बीमारी को जीतना चाहते थे। लेकिन यह आत्मिक बल से दैहिक व्याधि को जीतना ही नहीं था। यहीं, देवास के मालवा में, उनके संगीत का भी आत्म साक्षात्कार हुआ। यानी उनका संगीत बीमार शास्त्र के शरीर से मुक्त होकर लोक संगीत में आत्मसात् हुआ।
सब कहते हैं कि 1952 में अच्छे होने के बाद कुमार ने जो गाया वह खुद उसने या किसी ने भी पहले नहीं गाया था। देवास में हुए दुहरे आत्म-साक्षात्कार के बाद कुमार जी का संगीत काशी में गंगा की तरह हो गया था। और काशी में गंगा सबसे बड़ा तीर्थ इसलिए है कि पूरब की तरफ से बहते हुए वहीं वह उत्तर की ओर मुड़ती है। काशी वह जगह है जहां गंगा अपने मूल गंगोत्री की ओर देखकर टेरती है, जैसे कुमार जी के गाने में लोकसंगीत की आदिम हूक उठती है। यही आदिम हूक कबीर के भजन सुनते हुए मुझे और आपको उस शून्य शिखर पर ले जाती है जहां अनहद बज रहा है। गंगा को उत्तर की ओर मोडऩे वाली वही काशी विश्वनाथ की नगरी है और कबीर की भी। देवास में टीबी से मुक्त हुए शिव के भक्त कुमार गंधर्व ने शिव की नगरी की गंगा और उसके सबसे बड़े कवि कबीर को पा लिया। कुमार जी के संगीत में शिव, गंगोत्री को टेरती गंगा और कबीर के रागमय दर्शन की त्रिवेणी है।
कुमार गंधर्व का देवास आना संयोग नहीं था। यह भी संयोग नहीं है कि वहां पांच साल तक बिस्तर पर पड़े क्षय से जूझते हुए कुमार गंधर्व मालवा के अक्षय लोकसंगीत के स्वर और धुनें सुनते रहे। कोई भी रिनेसां (पुनर्जागरण) मूल को, जड़ों को खोजे और उनसे जुड़े बिना नहीं होता। यूरोप के रिनेसां में ग्रीक और लैटिन की जड़ों की खोज हुई और अलग अलग स्तरों पर अद्भुत प्रतिभा के लोगों ने उनसे अपने को जोड़ा। तभी पश्चिम की सभ्यता में नयी जान आयी और वह संसार भर में फैल गयी। ऐसे पुनर्जागरण या पुनर्जन्म को सत्य यह है कि हमारी जड़ हमारी गर्भनाल है। जन्म लेते ही उसे काटना पड़ता है, लेकिन हमारी आदिम हूक गर्भनाल से फिर जुड़ जाने की हमारी अक्षय-अक्षत इच्छा है। सारा सृजन गर्भनाल से जुडऩे की इस इच्छा से होता है। यह कैसे हो सकता था कि कुमार गंधर्व जैसे सृजनशील कलाकार शास्त्रीय संगीत को लोकसंगीत की गर्भनाल से नहीं जोड़ते? उन्हें टीबी नहीं, कोई और रोग भी हो सकता था। वे देवास नहीं आते, कहीं और भी जा सकते थे। वे अपने संगीत की जड़े मालवी नहीं किसी और इलाके के लोकसंगीत से भी जोड़ सकते थे, लेकिन लोक संगीत से शास्त्रीय संगीत का अभिषेक किये बिना वे नया सृजन नहीं कर पाते। दूसरे शास्त्रीय गायकों की तरह चौखटों और घरानों की कुलीगिरी करते रहते।Kumar_gandarbh1
यह कुलीगिरी भी कुमार जी का ही शब्द है। भारत की भक्ति कविता की बात करते हुए जब वे कबीर, सूर, मीरा और तुलसी पर आते हैं तो कहते हैं कि सूर, मीरा और तुलसी भक्ति की महान परंपरा के वाहक हैं। उनकी कविता अच्छी है, बहुत अच्छी, लेकिन कबीर की बात अलग है। वे अपने को राम की बहुरिया मानते हैं, लेकिन उनका अहम् भी गजब का है। सबकी ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ है। देवता, ऋषि-मुनि, सबने चदरिया ओढ़ी है, लेकिन उसे मैली कर दिया है। एक दास कबीर ही हैं जिसने इतने जतन से चादर ओढ़ी कि ज्यों की त्यों रख दी है। कबीर अपने को दास भी मानते हैं और इतना जतन वाला भी कि देवता और ऋषि मुनि से भी चादर ओढऩे में अपने को ऊंचा। वे सिद्ध भी हैं और समाधि भी, मौनी भी हैं और बोलते भी हैं। ना आते हैं, ना जाते हैं, ना मिटते हैं। वे सबमें हैं, सब उनमें हैं, फिर भी अक्सर वो अकेले हैं। ऐसी कबीर स्वयं को किसी बह्म से कम नहीं मानते होंगे। कुमार जी कहते हैं कि सूर, तुलसी, मीरा सब गिड़गिड़ाते हैं, अपने को दीन हीन समझते हैं, बल्कि तुलसीदास तो अपने को कुटिल, खल, कामी भी बता देते हैं। एक कबीर हैं जिनमें यह हीनता, दयनीयता और आत्म-दया कहीं नहीं दिखती। कबीर ही हैं जो कुलीगिरी नहीं करते।
कुमार गंधर्व सिर्फ गायक नहीं है। कन्नड़ जिनकी मातृभाषा है और मराठी दूसरी भाषा, उन कुमार जी से आप हिन्दी की भक्ति कविता पर चाहे जैसे बात कर लीजिए। और कबीर पर तो उनका अधिकार हजारी प्रसाद द्धिवेदी से कम नहीं है। कबीर को गाकर जैसी व्याख्या कुमार गंधर्व ने की है, वैसा तो खैर कोई कर ही नहीं सका है। संगीत में कुमार जी अपने को कबीर मानते हों तो हमें अचरज नहीं होना चाहिए। दूसरे कई बड़े शास्त्रीय गायकों की तुलना में कुमार गंधर्व ऊंचे बैठते हैं, क्योंकि वे कुलीगिरी नहीं करते।
कई समझदारों ने कहा है कि कुमार जी एक बंदिश, एक भजन, एक लोकगीत सभी जगह एक जैसा नहीं गाते। वे गाते हुए सृजन करते हैं, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि सृजन की पीड़ा और आनंद को सुनने वालों तक पहुंचाते हैं और सृजन में उन्हें भागीदार बना लेते हैं। कुमार जी को मालवा क्यों पसंद है? इसलिए कि मालवा आनन्द प्रदेश है भई। यहां ना ज्यादा गर्मी, न ज्यादा ठंड, न ज्यादा बारिश। ज्यादा गर्मी-ठंड सुख दुख की तरह है। आनंद है सम में। राजस्थानी होते तो पानी के लिए तरसते। कश्मीरी होते तो बरसात का मजा ले ही नहीं सकते थे। वर्षा का जो मजा आपको मेघदूत में मिलता है वह सिर्फ मालवे की बरसात में है। और कुमार जी की वर्षा की ध्वनियों और स्वभाव की समझ देखनी हो तो ‘घन गरजन आये’ यानी ‘गीत वर्षा’ सुन लीजिए।
ऐसे कुमार गंधर्व फितरती हैं-महान गायक नहीं होते तो लेखक होते, लेखक नहीं होते तो चित्रकार होते-यानी समन्दर में होते तो तूफान होते। उनके जैसे विभूति पुरूष ही मालवे के भेरू जी हो सकते थे। ग्राम- संस्कृति के रक्षक शिव, ग्राम-देवता। मालवा में जन्मे मेरी पीढ़ी के लोग वड्र्सवर्थ की तरह कह सकते हैं कि आजादी की उस भोर में जन्म लेना आनंद था, लेकिन उसमें जवान होना तो बिल्कुल स्वर्गिक आनंद था, वह आनंद जो कुमार गंधर्व की भैरवी के साथ शुरू होता है और कलाई के हलके से उछाल के साथ शाम के आकाश में थिगते कोट्टारी कनकैया नायडू के छक्के के साथ डूबता। सी.के. जैसा छक्का कोई नहीं मार सकता, और है कोई अवधूत जो कुमार जी जैसी तान लगा सके?
यह लेख कुमार गंधर्व जी के साठवें जन्मदिन पर दिग्गज पत्रकार स्वर्गीय श्री प्रभाष जोशी जी ने लिखा था। म्यूजिकल हेरीटेज के निवेदन पर ये लेख प्रभाष जी के पुत्र श्री संदीप जोशी ने मुहैया कराया था। म्यूजिकल हेरीटेज भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने की एक मुहिम है। ज्यादा जानकारी के लिए लॉगिन करें www.amusiclheritage.in