किसी समय बारिश हमारी इच्छा के अनुसार होती थी।

प्रख्यात गौ विशेषज्ञ श्री सुबोध कुमार बताते हैं कि यदि हम भारतीय ज्ञान परंपरा और व्यवहार को देखें तो पाएंगे कि हमने मानसून को अपनी इच्छानुसार बरसने वाला बना लिया था। यजुर्वेद की वैदिक राष्ट्र प्रार्थना में हमने बादलों के अपनी इच्छा के अनुसार बरसने की कामना की है। वेदों में वर्षा का विज्ञान और उस में गायों की महत्वपूर्ण भूमिका को काफी विस्तार से समझाया गया है।
अथर्ववेद में गौमाता को पर्जन्यपत्नी यानी बादलों की पत्नी कहा गया है। गौमाता जो देवतास्वरूप है और ज्ञानी जनों को ही प्राप्त होती हैं बादलों के द्वारा बरसाए गए पानी से सबका पालन करती है। वेदों की इस बात को आज का विज्ञान भी मानने लगा है।
आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जहां गायें होती हैं, पर्जन्य यानी मेघ भी वहीं वर्षा करते हैं और जहां गायें होती हैं, पृथ्वी भी वहीं वर्षा के जल को अपने अंदर संचित करके रखती है। वर्षा के जल से पृथ्वी वनस्पति रूपी संतान देती है और हरी भरी रहती है। जहां पृथ्वी पर गायें नहीं होंगी, वहां पृथ्वी बांझ हो जाएगी, और मेघ भी वहां वर्षा करने के लिए नहीं आएंगे।
गोचर का गौ के लिए यही महत्व है। यह दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिक एलेन सेवोरी के अनुसंधान से यह सिद्ध भी हो गया है। वह भूमि जहां गौओं का गोबर और गोमूत्र उनके खुरों द्वारा मिट्टी में गूंद दिये जाते हों, वहां की मिट्टी की वर्षा के जल को सोख लेने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है। हरियाली बनी रहती है। हरियाली में पनप रहे सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा आकाश में बादलों को प्रभावित करने से वर्षा होती है। इसके परिणामस्वरूप गोचरों में हरियाली बनी रहती है। इसीलिए वेद ने गौ को पर्जन्यपत्नी बताया। प्राचीन काल में गोचर बहुत बड़े होते थे। जब गोचर के क्षेत्र से गौएं घास खा लेती थीं तब जो क्षेत्र घास वाले होते थे, वहां चली जाती थीं। इस प्रकार गोचर में घास की कभी कमी नहीं रहती थी। आधुनिक काल में गोचरों का संचालन एक वैज्ञानिक विषय है। हमारे देश में भी गोचर विकास और प्रबंधन भी पशुपालन शिक्षा अनुसंधान पर कार्य होना चाहिए। More …..