वैद्य गुरूदत्त और एम.एन.राय

उत्तर प्रदेश के अवध प्रान्त में जिला रायबरेली के पड़ौस में जिला सुलतानपुर में एक ताल्लुकेदारी अमेठी थी। इस ताल्लुकेदारी का मालिक राजा कहाता था और राजा का बड़ा लड़का युवराज तथा छोटे लड़के राजकुमार कहे जाते थे।
वैसे इनके अधिकार शून्य समान थे। इन पर डिप्टी कमिश्नर शासन करता था। जब मैं अमेठी पहुंचा तो राजा भगवान सिंह उस ताल्लुकेदारी के मालिक थे। इनके तृतीय पुत्र राजकुमार रणंजयसिंह, सैन्ट्रल लैजिस्लेटिव असेम्बली के सदस्य निर्वाचित हुए थे। उन्होंने मुझे अपना प्राइवेट सैक्रेटरी नियुक्त किया तो मैं वहां पहुंच गया। दो सौ रुपए वेतन और रहने को स्थान यही मुख्य शर्तें थीं। मैं 7 दिसम्बर 1926 को वहां काम पर नियुक्त हुआ था।
उन दिनों मैं पुनः आर्यसमाज के कार्य में रुचि लेने लगा था। कारण था कुछ तो कुंवर साहब का आर्यसमाज में जाना और कुछ देश की गतिविधियां देखकर। देश के राजनीतिक क्षेत्रों में अभी भी कांग्रेस का बल पर्याप्त था, यद्यपि पहले से बहुत कम हो चुका था।
उत्तरी भारत में मालवीयजी तथा लाजपतरायजी के नेतृत्व में स्थापित इण्डियन नैशनलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी थी। केन्द्रीय लैजिस्लटिव असैम्बली में चालीस सदस्य कांग्रेस के थे और बत्तीस-तैंतीस नैशनलिस्ट पार्टी के थे।
कांग्रेस के नेता पण्डित मोतीलाल नेहरु थे और नैशनलिस्ट पार्टी के मदनमोहन मालवीय। मुस्लिम लीग के भी तीस के लगभग सदस्य थे। इस दल के नेता मिस्टर मुहम्मद अली जिन्ना थे। मोतीलाल नेहरु 1922 की कांग्रेस के बल की-सी आशा 1927 में भी करते थे, परन्तु वैसा नहीं। मुसलमानों का पृथक् दल बनना स्वाभाविक था। उनकी मतदाता सूचियां पृथक् थीं। उनके सदस्य वे ही चुन सकते थे। साथ ही मुसलमानों की जनसंख्या की अपेक्षा से अधिक उनका प्रतिनिधित्व था।
दो-चार मुसलमान कांग्रेस पार्टी में थे। वे अपनी जाती-रसूख से निर्वाचित हुए थे।
कुंवर रणंजयसिंह नैशनलिस्ट पार्टी के टिकट पर कांग्रेसी प्रत्याशी को पराजित कर निवार्चित हुए थे। इस हार का पण्डित मोतीलाल को बहुत दुःख प्रकट किया है।
असेम्बली का कार्य तो वर्ष में अढाई-तीन मास ही होता था। शेष कभी किसी आर्यसमाज तथा अन्य सार्वजनिक समारोह में कुंवर साहब जाते तो मुझे साथ जाना पड़ता था, अन्यथा मैं खाली ही रहता था।

अमेठी गांव तो रेल की लाइन पर एक स्टेशन है। राजकुमार और उनके परिवार के लोग रेलवे स्टेशन से तीन चार मील के अन्तर पर रामनगर गांव में रहते थे। मुझे अमेठी में रहने को स्थान मिल हुआ था और मैं नित्य बाईसिकल पर रामनगर जाता था। वहां नित्य की डाक का काम कर लौट आया करता था। नित्य तीन चार पत्रों से अधिक नहीं होते थे। परिणाम स्वरुप मुझे अवकाश बहुत था। इस अवकाश के काल में मैंने आर्यसमाज के साहित्य का गम्भीर अध्ययन किया और मैं पुनः आस्तिक तथा प्रजातंत्रवादी हो गया।
चूंकि लाहौर मैं भी मुझे मजीद के विचार पसन्द नहीं थे, उस नापसन्दगी में मजीद का हिजरत कर भारत छोड़कर चले जाने का इतिहास भी एक कारण था। परन्तु अब तो मैं कम्युनिज्म के सिद्धान्तों का विरोधी हो रहा था।
इन दिनों की एक घटना उल्लेखनीय है। रविवार का दिन था। मैं अमेठी आर्यसमाज के सत्संग पर गया हुआ था। एक खद्दरधारी, रूपरंग से बंगाली सज्जन कुंवर रणंजयसिंह का नाम लेते हुए वहां पहुंच गए। उसे बताया गया था कि कुंवर साहब के प्राइवेट सैक्रेटरी आर्यसमाज मन्दिर में मिलेंगे। मिलने पर उसने अपना नाम डॉ. बैनर्जी बताया और कुंवर साहब का मित्र प्रकट किया। उस दिन कुंवर साहब लखनऊ गए हुए थे। मैंने उन्हें यह बताया तो बैनर्जी साहब ने चर्चा आरम्भ कर दी। चर्चा वेद मंत्र पर हुई। उनका प्रश्न था, यह इन्द्र, वरुण नाम परमात्मा के क्यों रखे गए हैं? इस प्रकार एक वस्तु के अनेक नाम रखने से विभ्रम हो सकता है।

परमात्मा के अनेक गुण होने से उसके अनेक नाम सार्थक हैं। मेरा उत्तर था।

परमात्मा तो निर्गुण कहा जाता है?

वहां गुण के अर्थ वह नहीं जो आप समझे हैं। वे भिन्न हैं। वैसे कोई भी पदार्थ निर्गुण नहीं हो सकता। पदार्थ होगा तो उसके गुण भी होंगे।

थोड़ी देर में वार्तालाप परमात्मा से आरम्भ होकर रोटी, कपड़े पर आ गया।

उसका कहना था-सबको ये पदार्थ मिलने चाहिए।

हां दान दक्षिणा में। परन्तु अधिकार तो परिश्रम करने वाले का है। जो उपजाऊ कार्य नहीं करता वह भूखा मरे तो विस्मय करने की बात नहीं।

यह तो निर्दयता होगी?

दयावान यतीमखाने खोल देंगे।

परन्तु जिनके पास फालतू है, उनको देने के लिए विवश क्यों न करें?

कौन विवश करे?

सरकार।

वह तो सब लूटकर इंग्लैण्ड ले जाएगी?

सरकार अपनी हो जाएगी, तब

सरकार तो नौकरशाही होगी। वे लोग धनियों से लेकर अपने घर ले जाकर गुलछर्रे उडाएंगे।

नहीं, यह नहीं होगा?

कौन नहीं होने देगा

जनता, जो सरकार बनाएगी।

मेरी हंसी निकल गई। मैंने कहा, पण्डित जवाहरलाल और मोतीलाल? ठीक है न?

वह मेरी हाजिर जवाबी पर और जवाहरलाल तथा मोतीलाल का नाम सुन विस्मय में मेरे मुंह को देखता रह गया।

उसने समझा था कि कोई देहाती आठवी-दसवीं श्रेणी तक शिक्षित आर्यसमाज में उपदेश के लिए नौकर रखा हुआ है। मेरे उत्तर पर पूछने लगा, कितना पढ़े हैं?
मैंने बताया, एम.एस.सी कैमिस्ट्री हूं।

फिर भी परमात्मा को मानते हैं?

क्योंकि परमात्मा एक वैज्ञानिक सिद्ध पदार्थ है।

वह हंस पड़ा और अपना परिचय देने लगा। उसने पूछा, किसी एम.एन. राय का नाम सुना है?

जी। मेरठ केस फरार।

वह हंसते हुए धीरे से बोला, वह मैं हूं।

परन्तु आपका नाम कुंवर साहब के मुख से कभी सुना नहीं?

फिर भी हम मित्र हैं। मेरे पिता यहां पोस्ट-मास्टर थे। मैं रणंजयसिंह जी के साथ खेला करता था। इस परिचय पर भी मैंने मिस्टर राय से कह दिया, मैं कुछ अधिक सहायता नहीं कर सकता। हां आप लखनऊ में कुंवर साहब से मिल सकते हैं। वह राजा साहब, काला कांकर की कोठी में ठहरे हुए हैं। उनको बाजार से पूरी बनवाकर खिलाई और जाने के लिए पांच रुपए दिए जिससे वह लखनऊ में उनसे मिला था।

उन दिनों मैं एम.एन. राय को एक बहुत बड़े कम्युनिस्टों के नेता के नाम से जानता था। उसे मैंने मजीद की बात भी बताई। वह बीफ और पोर्क की बात सुन खूब हंसा और आर्यसमाज में बैठे बीफ खाने की बात सुन मुझसे पूछने लगा-आपके लिए धर्म-संकट उत्पन्न हो जाता, अगर वह कुछ भी बु़द्धि रखता?
मेरा उत्तर था, मैं मुसलमानों को इतना बुद्धिमान् नहीं मानता। न ही अपना धर्म इतना पतला मानता हूं।

यह सन् 1930 के दिन थे। गांधीजी राउण्ड टेबल कान्फरेन्स पर लन्दन गए हुए थे। अमेठी ताल्लुकेदारी कोर्ट ऑफ वार्ड्ज में थी।मैं अमेठी में पांच वर्ष तक रहा। यह काल मेरा नास्तिकता और कम्युनिज्म की ओर से वापस लौटने का था। मेरा मनन स्वाध्याय के बल पर हुआ था, जो यहां खूब चलता था।

डिप्टी कमिश्नर मेरी गतिविधियों पर बहुत नाराज था। इन दिनों श्री यशपाल (क्रान्तिकारी) और उनकी धर्मपत्नी अमेठी में मेरे पास रहते थे। सरदार भगतसिंह के मुकद्दमे में मैं पुलिस के गवाह के रूप में बुलाया गया था। इसका स्पष्ट अर्थ था कि मेरा उन क्रान्तिकारियों से सम्पर्क था।यही कारण था कि डिप्टी कमिश्नर मेरे सख्त खिलाफ था और मेरा काम अमेठी से छूटने पर उसने सुख की सांस ली।अक्तूबर 1931 में मुझे अमेठी से सेवामुक्त किया गया

संदर्भ – भाग्य और भावना, भाग्यचक्र