एक बार फिर से समाधान है ‘‘ शून्य लागत खेती ’’

दिल्लीवासियों की एक बड़ी समस्या है प्रदूषण। आमतौर पर हम कारखानों और खेत में जलने वाली पराली को ही इसका जिम्मेदार मानते रहे हैं, परंतु अब पता चल रहा है कि खेती में प्रयोग किए जाने वाले रसायनों से भी खतरनाक प्रदूषण फैल रहा है। यह बात बताई है द इंडियन नाइट्रोजन एसेसमेंट ग्रुप ने। इसके अनुसार नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड कार्बन डाई ऑक्साइड से 300 गुणा अधिक खतरनाक है और इसका एक प्रमुख स्रोत है खेतों में डाला जाने वाला यूरिया।
सैंटर ऑफ साइंस एंड एन्वायरनमैंट, नई दिल्ली नामक संस्था के अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जो इस प्रकार हैं –
1. एक अकेला किसान पांच दशकों में 6,610 किलो ग्राम से अधिक यूरिया का इस्तेमाल कर चुका है। जबकि पूरे देश में अब तक 195.88 मिलियन टन यूरिया का इस्तेमाल कर चुका है।
2. अब इससे नाइट्रोजन के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। नाइट्रोजन प्रदूषण का आकलन भारत में पहली बार 120 से अधिक वैज्ञानिकों ने किया है। इसमें नाइट्रोजन की यात्रा का पूरा लेखा जोखा है।
3. मूल्यांकन बताता है कि भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का अहम स्रोत कृषि है। इसका अधिकांश भाग नाइट्रोजन फर्टीलाइजर (उर्वरक) खासकर यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से आता है।
4. भारत में कृषि फसलों में यूरिया कृत्रिम फर्टीलाइजर का मुख्य स्रोत है। मूल्यांकन के अनुसार, देश में उत्पादित कुल नाइट्रोजन फर्टीलाइजर में इसकी हिस्सेदारी 84 प्रतिशत है।
संस्था ने यह रिपोर्ट 10 साल के अध्ययन के आधार पर जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसान भारी मात्रा में यूरिया व रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। इनमें से यूरिया का प्रयोग चावल और गेहूं की फसलों के लिए होता है, जिससे जमीन की उपजाऊ शक्ति पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही वातावरण भी प्रदूषित होता है।
इसका समाधान है रासायनिक खादों के प्रयोग को वर्जित करना। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑरगेनाइजेशन ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा था कि डेयरी गायों के पालन के लिए किए जाने वाले रासायनिक खेती के कारण सबसे अधिक प्रदूषण होता है। सवाल है कि क्या अब भी सरकार यूरिया पर अनुदान देना जारी रखेगी जोकि न केवल जहरीली फसलें पैदा कर रहा है, बल्कि प्रदूषण का भी एक बड़ा स्रोत है More …….