उद्योगों पर आधारित जाति व्यवस्था

राकेश उपाध्याय
लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में व्याख्याता है।


सभी इस तथ्य से सुपरिचित हैं कि वैदिक कालखंड के साथ औपनिषदिक समाज में तो संपूर्ण सृष्टि को ही ईश्वर का अंश बताकर सभी के अन्दर अन्तर्यामी परमात्मा के दर्शन का विधान किया गया। इसमें किसी के अस्पृश्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता था जबकि शूद्र वर्ण भी परमात्मरूप विराट पुरूष के अंग के रूप में स्वीकृत किया गया। प्रश्न यह है कि वर्ण और कार्य के आधार पर बनी जातियों में एक दूसरे के प्रति हेय दृष्टि का निर्माण करने अथवा छूत-अछूत और वेद पढऩे या न पढऩे के विषय के सन्दर्भ में शोषणकारी मनोवृत्तियों का आधार कहां और कब निर्मित हुआ? धर्मशास्त्रों विशेषकर स्मृति ग्रंथों में कर्म-विधान से अलग हटकर शूद्र वर्ण के प्रति ऐसे अस्वीकार्य विधान आखिर कैसे स्वीकृत कर लिए गए जो सामाजिक-दार्शनिक रूप से वेद और उपनिषद के मूल एकेश्वरमय सृष्टि सिद्धांत के विपरीत थे? इस प्रश्न के सन्दर्भ में वस्तुत: जिस गहराई से शोध तथा अनुसंधान कार्य और चिन्तन-चर्चा होनी चाहिए, उनका नितांत अभाव हमें अकादमिक जगत में दिखाई देता है। वर्ण और जाति के सन्दर्भ में प्रचलित घृणा आधारित वैमनस्य बढ़ाने वाली विचारधारा के आधार पर जो ग्रंथ गढ़े गए, उनमें हर लेखक ने आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत का ही सहारा लिया और आर्यों के भारत में काबिज होने की कहानी के जरिए ही सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की व्यवस्था पर जमकर हथौड़े चलाए। अब जबकि आर्य आक्रमण का सिद्धांत कोरा झूठ सिद्ध हो चुका है और वृहत्तर भारत राष्ट्र के करोड़ो मनुष्यों की डीएनए संरचना के द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि वृहत्तर भारत के मूल 99 प्रतिशत लोग इसी भूमि के आदि निवासी हैं तो विचार विशेष के लेखकों का शूद्र और दलित जातियों के सृजन और मौजूदा परिस्थिति के लिए भारतीय सामाजिक व्यवस्था को ही जिम्मेदार ठहराने का सारा गढ़ा हुआ सिद्धांत और वृतांत ही सवालों के घेरे में खड़ा हो जाता है। ऐसे में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर नवीन उदीयमान भारत के शोधार्थी के दृष्टिकोण से संपूर्ण शूद्र और दलित विमर्श को समझा जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इस दृष्टिकोण से हमने जब मूल धार्मिक स्रोतों (मूल संस्कृत पाठ) में शूद्र वर्ण की स्थिति के वर्णनों का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो सैंकड़ों की तादाद में चौंकाने वाले वक्तव्य और श्लोक हमें प्राप्त हुए जो प्रचलित घृणात्मक विचारधारा के विरूद्ध शूद्र वर्ण के गौरवमयी वास्तविक चित्र को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करते हैं। किन्तु शूद्र वर्ण पर किसी विमर्श या मीमांसा में विचार विशेष से प्रेरित लेखक वर्ग इन श्लोकों का रंचमात्र उल्लेख तक नहीं करता। कहीं अगर उल्लेख मिलता भी है तो केवल चलताऊ ढंग से संकेत करते हुए उसे घृणावादी सिद्धांत के सम्मुख इस दृष्टिकोण के साथ खारिज कर दिया जाता है कि भारत में मानव शोषणमूलक प्रवृत्तियां धार्मिक शास्त्रों की देन हैं। दूसरी ओर सच्चाई ये भी है कि घृणा और नफरत फैलाने वाली जो कथित थोड़ी बातें हैं, उन कुछ झूठी बातों को धार्मिक ग्रंथों का बताकर बार-बार विवेचित व छिद्रान्वेषित किया जाता है। इसके पीछे अनेक विद्वान विदेशी अंग्रेजी साजिश को कारण मानते हैं जिनका उद्देश्य विविधता और सुख-समृद्धि से सम्पन्न भारत वर्ष में विद्यमान मानव समूहों में घृणा फैलाकर अपने औपनिवेशिक लूट और अन्य स्वार्थ पूरे करना ही रहा है।
इस सन्दर्भ में भारत पर विदेशी शासन से जुड़े कुछ सन्दर्भों का उल्लेख आवश्यक है। भारत में गोरी, गजनवी, खिलजी, तुगलक, लोदी, मुगल आदि विधर्मी मुस्लिम वंशों ने जो भयानक अत्याचार और लूट का इतिहास रचा, उसने देश में दीन-दरिद्र और दलित होती चली गईं हिन्दू जातियों के सन्दर्भ में क्रूर अध्याय लिखे। उदाहरण के लिए इस्लाम स्वीकार न करने पर अथवा युद्ध में हारने पर अनेक राजाओं और उनके सैन्यबलों के गिरफ्तार सैनिकों से मुस्लिम शासकों ने हरम और किलों में बनाए गए पाखाने साफ कराने के कार्य कराए। इसी प्रक्रिया में से भारत में भंगी जाति का उदय हुआ जिसका उल्लेख मध्यकाल के पूर्व किसी भारतीय साहित्य में प्राप्त नहीं होता। विदेशी अत्याचारों की इस दुखदायी दास्तां में अंग्रेजी शासन ने भी भयानक नमक रगड़ा। उद्यम आधारित भारतीय ग्राम संरचना और जातीय संरचना को अंग्रेजों ने इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जिसमें दरिद्र हो जाने के कारण समाज के सारे श्रेष्ठ मूल्य और प्रतिमान मटियामेट हो गए। कल्पना करिए कि जो देश ईसा की पहली सदी में 35 प्रतिशत सालाना जीडीपी की दर से प्रगति कर रहा था और जिसकी विकास दर भयानक मुस्लिम आक्रमणों के बावजूद सन 1757 तक किसी भी हालत में 20 प्रतिशत वार्षिक विकास दर से नीचे नहीं दिखाई देती, वही देश अंग्रेजों के 200 साल के शासन में लगातार आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ता चला गया और जब 1947 में अंग्रेजों ने भारत को आजाद किया तो विश्व अर्थव्यवस्था में जीडीपी के आंकड़ों के हिसाब से भारत का योगदान सिमटकर 3 प्रतिशत के नीचे आ गया। भारत में ग्राम व्यवस्था के स्वावलंबन और जाति-व्यवस्था के पिछड़ेपन के पीछे की असलियत जीडीपी के यही आंकड़े प्रकट कर देते हैं। अंग्रेजी राज ने भारत का संपूर्ण कौशल-प्रतिभा-हुनर का नाश कर डाला जिसके कारण अधिसंख्य आबादी न केवल दीन-दरिद्र बनी बल्कि उनकी सामाजिक हैसियत भी जाती रही। जब पूरा देश ही पददलित हो गया तो फिर उसमें कितनी जातियां दीन और दलित बनीं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। भारत की प्राचीन आर्थिक समृद्धि के जीडीपी आंकड़ों के सन्दर्भ में विश्व विख्यात अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन का शोधपरक अध्ययन उल्लेखनीय है। अंग्रेजी राज में भारत की लूट और जातियों को पददलित बनाए जाने के क्रूर कथानक के सिलसिले में दादाभाई नरौजी और विल ड्यूरां के द्वारा दस्तावेजी संकलन भी भरपूर रोशनी डालते हैं।
भारतीय ग्राम संरचना मूलत: जाति आधारित समूहों के पारस्परिक अन्योन्याश्रित संबंधों की संरचना मानी जाती रही है। एक समय था कि स्वावलंबी जाति संरचना ही इसकी सबसे बड़ी ताकत थी जिसमें हर जाति की हुनर-कौशलयुक्त स्वतंत्र आर्थिक सत्ता थी और इसके कारण भारत के गांव-गांव, परिवार-परिवार और हर घर उत्पादन और कौशल-शिक्षा के अतुलनीय केंद्र थे। भारतीय ग्राम की इस संप्रभु जाति-शक्ति और इसके उत्पादक प्रभाव को ब्रिटिश सरकार ने भारत की समृद्धि का सबसे मूल कारण माना था। सन् 1830 में ब्रिटिश अफसरशाही के सबसे सुयोग्य अफसरों में एक सर चाल्र्स मेटकॉफ ने भारतीय ग्राम की जातिगत संरचना पर उल्लेखनीय निष्कर्ष प्रस्तुत किया था। मेटकॉफ के अनुसार, भारत में ग्राम्य जातियां छोटे छोटे गणराज्यों की तरह हैं, जिनके पास अपनी ज़रुरत की करीब करीब सभी चीजें उपलब्ध हैं। वे जरूरतों के लिहाज से बाहरी संबंधों से पूरी तरह मुक्त हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें पूरी तरह से आर्थिक स्थायित्व प्राप्त हैं। इन ग्राम जातियों में हरएक की अलग आज़ाद सत्ता है, उनके संघ बहुत ही ऊंचे दर्जे के हैं और उन्हें सब प्रकार की सुख-सुविधाएं हासिल हैं, वे बहुत हद तक आजादी और स्वावलंबन का पूरा इस्तेमाल करते हैं।
द डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारतीय ग्रामों की इस संप्रभु जाति-शक्ति को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने यह कहते हुए व्याख्यायित किया है कि हिन्दुस्तान के जिन हिस्सों पर अंग्रेजों ने सबसे ज्यादा वक्त तक शासन किया, वे हिस्से मौजूदा समय में (1944) सबसे ज्यादा गरीब माने जाते हैं। अंग्रेजों ने बंगाल में खुल्लमखुल्ला लूट शुरू की। जमीन से लगान किसानों के जिन्दा रहते ही नहीं बल्कि उनके मरने पर भी वसूल किया जाने लगा। अंग्रेज इतिहासकार एडवर्ड टॉमसन और जीटी गैरट का निष्कर्ष था कि अंग्रेजों के दिमाग में भारत की दौलत लूटने के लिए जबर्दस्त लालच भर गया। ऐसा लालच जिसकी मिसाल कोर्टेज और पिज़ारों के युग के स्पेनवासियों के समय से लेकर आजतक किसी देश में नहीं मिलती। खासतौर पर बंगाल में तो इस लालच के कारण शांति तब तक नहीं स्थापित हो सकती जब तक कि वह चूसते चूसते खोखला न रह जाए। एडवर्ट टॉमसन ने भारत में अंग्रेजों की लूट को दुनिया के इतिहास में राजनीतिक छल की सबसे बड़ी मिसाल बताया।
अमेरिकी लेखक ब्रुक एडम्स का कहना है कि इंग्लैंड में हिन्दुस्तान की दौलत का प्रवाह तेजी से होने लगा। इंग्लैंड की पूंजी बढऩे लगी और उसकी विकासदर तेजी से आगे बढऩे लगी। प्लासी की विजय (1757) के बाद अंग्रेजों के अधिकार में जो इलाके आए, उसने इंग्लैंड में तरक्की के रास्ते खोल दिए। 1770 के आस-पास जो औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड में हुई, उसके पीछे दौलत भारत के गांवों से खींच ली गई, इस तर्क से सभी सहमत हैं। शायद जब से दुनिया शुरू हुई है, किसी भी पूंजी से कभी भी इतना मुनाफा नहीं हुआ जितना की हिन्दुस्तान की लूट से, क्योंकि करीब करीब पचास बरस तक इस लूट में ग्रेट ब्रिटेन का मुकाबला करने वाला कोई और देश संसार में नहीं था। भारत की जनता की भयंकर गरीबी की यह असली और बुनियादी वजह है।
हकीकत यह है कि हिन्दुस्तान में औद्योगिक तरक्की के सभी साधन हमेशा उपलब्ध रहे हैं। यहां संगठन-सामथ्र्य प्रबल है, यहां के लोगों में तकनीकी हुनर है, खास बारीक काम करने वाले कलाकार-शिल्पकार और कौशलयुक्त लोगों की यहां भरमार रही है। हिंदुस्तान के लगातार शोषण के बावजूद यहां के लोगों में तरक्की की चाहत बनी रही और लोगों ने अपने गांवों में पैदावार बढ़ाकर और परंपरागत हुनर और रोजगार के साधनों को किसी तरह से जिन्दा रखकर पूंजी की पैदावार भी की। इतिहासकार मांटगुमरी मॉर्टिन 1940 में ब्रिटिश संसद की कमेटी के सामने भारत के शोषण पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि हिन्दुस्तान की औद्योगिक सामथ्र्य उसकी कृषि सामथ्र्य से किसी मायने में कम नहीं है। वह शख्स जो हिन्दुस्तान को खेतिहर देश की सिर्फ खेती पर आश्रित देश की हैसियत में लाना चाहता है, वह उसे सभ्यता के पैमाने पर रौंदना चाहता है।
जैसा कि डर था, वही हुआ। औद्योगिक क्रांति के बाद भारत के उत्पादन के लिए ब्रिटेन के बाजार को संसद के कानून से बंद कर दिया गया और भारत का बाजार अंग्रेजों के सामान के लिए पूरी तरह से खोल दिया गया। भारत से केवल कच्चा माल इंग्लैंड जाने लगा और वहां से तैयार माल भारत के बाजारों में बिकने आने लगा। नतीजा ये निकला कि हिन्दुस्तान का वस्त्र उद्योग पूरी तरह से तबाह हो गया। जुलाहों और सूत-कपड़े के कारोबार में लगे लोगों पर इसका भयानक असर हुआ। परंपरागत धंधे उजडऩे लगे। इनमें पानी के जहाज बनाने का धंधा, शीशे का कारोबारी उत्पादन, कागज का उत्पादन, धातुओं की ढलाई का काम समेत सैकड़ों तरह के काम धंधे नष्ट हो गए। इस तरह से अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान की आर्थिक तरक्की को रोक दिया और इसके कारण गांव-गांव में बड़ी तेजी से बेकारी और गरीबी बढऩे लगी, बेरोजगार लोग खेती की ओर बढ़े तो वहां अंग्रेजों की ज़मींदारी व्यवस्था ने हालत को और अधिक भयावह बना दिया।
वेलेंटाइन बाल ने अपनी पुस्तक जंगल लाइफ़ इन इंडिया में लिखा है कि भारत के बहुत सारे गांवों में लोहा गलाने की भट्टियां थीं। पहले ये भट्टियां करीब करीब हर गांव में थीं किन्तु अंग्रेजी शासन में यह उद्योग नष्ट कर दिया गया। लोहे के कारखानों का ठेका जगह जगह अंग्रेज कंपनियों को दे दिया गया। तरह तरह की ज़बरदस्तियों द्वारा इस भारतीय धंधे का नाश कर दिया गया और इसके कारण लाखों भारतीय लोहारों और कोलों की ग्राम ग्राम में फैली स्वावलंबी जीविका का अन्त हो गया। सन् 1908 में सर जॉर्ज वाट ने कमर्शियल प्रोडक्ट्स ऑफ इंडिया नामक एक पुस्तक प्रकाशित की। इसमें लिखा है कि भारत में प्राचीन काल से लोहे को गलाने और कच्चे अयस्क से लोहा बनाने की टेक्नॉलॉजी मौजूद थी जो विकेंद्रित और ग्रामों तक में फैली हुई थी। यहां तक कि दमिश्क की मशहूर तलवारें भारत के फौलाद से ही बनती थीं। हैदराबाद अपनी तलवारों और खंजर के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध था। किन्तु जब इंग्लिश राज भारत में आया तो रेलवे लाइन बिछाने में इंग्लैंड के लोहे का इस्तेमाल किया जाने लगा। भारत में तब हमने (अंग्रेजों ने) लोहे का कारोबार हाथ में लेकर पुरातन भारतीय लोहा उद्योग को तहस-नहस कर डाला।
भारत में कागज़ उद्योग को लेकर भी जॉर्ज वाट ने वर्णन किया है कि भारत में सन के जरिए कागज बनाने का मसाला तैयार किया जाता था। भारतीय कारीगरों की इस कला ने चीन के कागज उद्योग को भी पीछे छोड़ दिया। भारतीय कागज के कारखाने देश की सारी ज़रुरत पूरी करने में सक्षम थे। लेकिन सर चाल्र्स वुड ने जब भारत मंत्री का पद संभाला तो हुकुमनामा निकाला कि इस्तेमाल के लिए जो भी कागज़ खरीदा जाए वह सब ब्रिटेन का बना होना चाहिए। इस आदेश के कारण देसी कागज उद्योग का नाश होने लगा। स्पष्ट रूप से रोजगार के लिए देसी कागज उद्योग पर आश्रित लोग लाखों की तादाद में कंगाल हो गए।
पंडित जवाहर लाल नेहरु डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं – ऐसे गांव, जहां बाहरी मदद की जरूरत कभी नहीं पड़ी और जहां परंपरा से काम-धंधे आपस में इस कदर बंटे हुए थे कि कोई किसी की सीमा में अतिक्रमण नहीं करता था, वे धंधे अपनी पुरानी शक्ल में बच नहीं सके। अंग्रेजी राज में लूट के कारण जो तब्दीली आई, वह स्वाभाविक क्रम में नहीं थी और उसने हिन्दुस्तानी समाज की सारी आर्थिक बुनियाद को तहस-नहस कर डाला। एक ऐसा ढांचा जिसके पीछे सामाजिक नियंत्रण था और जो जनता की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा था, अचानक ही अपने आप बदल दिया गया, और एक दूसरा ढांचा जिसका शक्ति केंद्र या संचालन केंद्र भारत के बाहर इंग्लैंड में था, वह भारत पर थोप दिया गया। हिन्दुस्तान दुनिया के बाजार से गायब हो गया और केवलमात्र खेतिहर देश की हैसियत रखने वाला अंग्रेजों का पुछल्ला देश बन गया।
वर्ष 1916 में इंडस्ट्रियल कमीशन को आपत्तिस्वरूप लिखे अपने विस्तृत पत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक भारतरत्न पंडित महामना मदनमोहन मालवीय ने अंग्रेजी अत्याचार का कच्चा चि_ा खोलकर रख दिया। उन्होंने इस पत्र के द्वारा अंग्रेज सरकार के इस दावे की धज्जियां उड़ा दीं कि भारत के लोगों में उद्यमिता का अभाव है और उद्योग-धंधों की स्थापना और उन्हें बढ़ाने में उनकी कोई रुचि अतीत में नहीं रही है।
स्पष्ट रूप से अंग्रेजों ने न केवल आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भारत के सामने भयानक रूकावटें खड़ी कीं बल्कि स्वतंत्रता आन्दोलन से निपटने के लिए भारतीय समाज के भीतर 800 साल की गुलामी के कारण आई कुरीतियों का ठीकरा भी हिन्दू धर्म के साहित्य पर पटक दिया। बड़े पैमाने पर धार्मिक साहित्य में प्रक्षिप्त अंश डाले गए और जोर-शोर से निम्न जातियों के शोषण के लिए ऊंची जातियों को जिम्मेदार ठहराकर समाज में संघर्ष पैदा करने की नई युक्ति तैयार कर दी गई। साल 1828 के बाद हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद के कार्य में तेजी आई और अनेक विद्वानों और पंडितों को लाखों रुपये की फैलोशिप एवं अन्य तरीकों से रिश्वत देकर संस्कृत की मूल पांडुलिपियों में भयानक प्रक्षिप्तता पैदा कर उनके अनुवाद का प्रकाशन इस तरह से किया गया कि मानो भारत में हजारों साल से शोषण की ही गाथा लिखी जा रही थी और अंग्रेजों ने भारत आकर देश और समाज पर महान उपकार ही कर डाला।
सनातन हिन्दू वैदिक धर्म से जुड़े ग्रंथों में इस प्रक्षिप्त मिलावट के लिए अंग्रेजी शासन के दौरान बहुत ही चालाकी से सन् 1784 में कोलकाता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स की अगुवाई में अंग्रेज अफसर विलियम जोन्स द्वारा की गई। इसके मूल उद्देश्यों और कार्यों में सर्वप्रधान कार्य प्राचीन धार्मिक और साहित्य से जुड़ी पांडुलिपियों का संकलन था। इन पांडुलिपियों के संकलन के पीछे का उद्देश्य सामान्य रूप से प्राचीन भारतीय ज्ञान का अंग्रेजी में अनुवाद और इसका प्रचार ही बताया गया किन्तु इसकी आड़ में संपूर्ण भारतीय वैदिक वांग्मय के साथ अंग्रेजों ने वैसा ही घिनौना बर्ताव किया जैसा कि उन्होंने भारतीय उद्योगों, भारतीय ग्राम एवं जाति संरचना के साथ किया था। इस कार्य में कोलकाता के विद्वान आचार्य पंडित तारानाथ तर्कवाचस्पति को अंग्रेजों ने हथियार बनाया। पंडित तारानाथ कोलकाता में एक संस्कृत स्कूल के आचार्य थे। 1866 में पंडित तारानाथ तर्कवाचस्पति को अंग्रेजी शासन के मनोनुकूल अंग्रेज विद्वानों के कथनानुसार संस्कृत शब्दकोष तैयार करने के लिए उस समय 10000 रुपये की भारी भरकम राशि दी गई। वर्ष 1930 में अंग्रेजी सरकार के अधीन विद्यालयों में हेडमास्टर की पगार 20 रुपये महीने से भी कम थी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंडित तारानाथ को 1866 में कितनी पगार मिलती रही होगी। वह उन दिनों 10 रुपये मासिक की पगार भी नहीं पाते थे। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने साल 1806 में भारत में पेपर करेंसी शुरू की थी। आंकलन के अनुसार पंडित तारानाथ को एक संस्कृत शब्दकोष तैयार करने के लिए आज के हिसाब से 30 लाख रुपये से ज्यादा की रकम अंग्रेजों ने दी। परिणाम ये निकला कि पंडित तारानाथ तर्कवाचस्पति के द्वारा तैयार किए गए शब्दकोष का सहारा लेकर अंग्रेज विद्वानों ने वैदिक संहिताओं के मनमाने अर्थ किए, यहां तक कि वैदिक संहिताओं में ब्राह्मणों को गोहत्या या गोमांस सेवन करते हुए पाए जाने वाले श्लोक तक खोज निकाले गए। इस भयानक और विद्रुप संहिता अनुवाद के पीछे रिश्वत पर आधारित बौद्धिकता का जो प्रलाप भारत में तब शुरू हुआ वह आजतक चल रहा है।
पंडित तारानाथ तर्कवाचस्पति के मानसपुत्रों ने आगे चलकर हर ग्रंथ में शूद्रों के प्रति वैमनस्य भरे श्लोकों, आर्य आक्रमण, मूल द्रविणों के दक्षिण पलायन समेत देश के सामाजिक विभाजन और अंग्रेजों के इस दावे को सही ठहराने की पुरजोर कोशिश की शुरूआत कर दी कि भारत में अंग्रेजों को भगाने के लिए आजादी का आन्दोलन चलाना आधारहीन है। अगर अंग्रेजों के विदेशी होने के आधार पर ही आन्दोलन चल रहा है तो मुगल व मुस्लिम भी विदेशी थे, तुर्क-तुगलक विदेशी थे, जो हिन्दू हैं, वो आर्य थे और वह भी विदेशी आक्रमणकारी आर्यों की संतान हैं। इस प्रकार से साहित्य में रिश्वत के जरिए झूठे-मनगढ़ंत सिद्धांत अंग्रेजों ने तैयार कराए और प्रक्षिप्त अंशों के साथ ग्रंथ प्रकाशित कर कई मूल पांडुलिपियों को आग के हवाले करने का पाप भी अंग्रेजों ने जानबूझकर किया ताकि भविष्य में सत्य के सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे।