उत्पादन ही नहीं, विपणन पर भी दें ध्यान

उत्पादन ही नहीं, विपणन पर भी दें ध्यान

डॉ. जे. पी. शर्मा और डॉ. रेशमा गिल

किसानों की आय को दुगुनी करने का नारा पिछले दो वर्षों से काफी प्रचलित हो गया है। भारत के निर्माण में इसकी काफी अहम् भूमिका है। स्वाधीनता से पूर्व अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर स्वाधीनता के बाद के लोकतांत्रिक शासन तक सारा ध्यान केवल कृषि उत्पादन को बढ़ाने पर ही था, ताकि हम अनाज की कमी से उबर सकें और देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकें। दुर्भाग्यवश उत्पादन बढ़ाने पर अतिरिक्त जोर देते हुए किसानों और उनके हितों की उपेक्षा कर दी गई। स्वाधीनता के इन 70 वर्षों में किसानों की सबसे अधिक उपेक्षा हुई, जो मौसम, आर्थिक संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। कृषि उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों में किसानों की आय बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया। नीतिनिर्माण के स्तर पर किसानों की आय बढ़ाने की उपेक्षा करने के कारण आज हम पाते हैं कि किसान खेती या तो खेती छोड़ रहे हैं या फिर वे खेतों पर कम और समर्थन मूल्य या बाजार की सुविधा आदि की मांग को लेकर सड़कों पर अधिक अधिक दिखते हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि केवल उत्पादन बढ़ाकर किसानों की स्थिति को नहीं सुधारा जा सकता। इसलिए आज कृषि नीतियों की प्राथमिकता कृषि उत्पादन को बढ़ाना नहीं, बल्कि बाजारोन्मुखता तथा किसानों की मांग को समझ कर किसानों की वास्तविक आय को बढ़ाना है।
भारत की कृषि और पर्यावरण की विविधता के कारण विश्व बाजार में असीम संभावनाएं हैं। इसके लिए भारतीय कृषि को बाजार के ढांचागत विकास के द्वारा आपूर्ति श्रृंखला को सुधार कर खेतों से घर तक के विचार को धरातल पर उतारना होगा। उत्पादन-वृद्धि में कीर्तिमान स्थापित करने के बाद अब कृषि-विपणन, उत्पादन के पश्चात प्रबंधन और मूल्य संवर्धन पर ध्यान देना होगा। दुर्भाग्य की बात यह है कि वर्तमान आपूर्ति श्रृंखला में किसान की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। किसी भी उत्पाद की उपभोक्ता द्वारा चुकाए गए मूल्य का न्यूनतम हिस्सा ही उसके उत्पादक यानी कि किसानों को मिल रहा है। अनेक अध्ययनों से यह तथ्य पता चला है कि अपने देश में उपभोक्ता द्वारा चुकाए गए मूल्य का केवल 10 से 23 प्रतिशत ही उत्पादक यानी कि किसानों तक पहुँचता है, जबकि विकसित देशों में 60 से 81 प्रतिशत तक। भले ही उपभोक्ता अधिक मूल्य चुकाने के लिए तैयार हों या फिर चुका रहे हों, बारीश में भीग कर और धूप में पसीना बहाकर वास्तविक मेहनत करके अनाज उगाने वाले किसान को उस मूल्य का नगण्य हिस्सा ही मिल पाता है। उपभोक्ता द्वारा चुकाए गए मूल्य और उसमें किसानों को मिलने वाले हिस्से पर हमने दिल्ली राजधानी क्षेत्र में एक अध्ययन किया। उसके परिणाम चौंकाने वाले थे। (देखें टेबल 1) इससे यह पता चलता है कि किसान और उपभोक्ता के बीच में जितनी अधिक दूरी होगी, उतना ही किसान का हिस्सा घटता जाएगा।
विपणन में कमजोर होने के कारण किसान अपनी फसल बिचौलियों और अन्य माध्यमों से बेचने के लिए बाध्य होते हैं। इससे उनकी आय काफी घट जाती है। इसलिए विपणन और फसलोपरांत प्रबंधन से किसानों की आय में काफी वृद्धि की जा सकती है। इसके लिए अधिक लागत की आवश्यकता वाले उत्पादों के लिए सामूहिक प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। बाजार का ढांचागत विकास और भंडारण की सुविधा का विकास दूसरी चुनौति है। सरकारी योजनाओं के प्रति किसानों में जागरूकता लाने की भी काफी आवश्यकता है। कृषि उत्पादों के विपणन के लिए कई सरकारी योजनाएं और नीतियां बनी हैं, उनको किसान तक पहुँचाना चाहिए। पूरे देश के लिए एकसमान बाजार नीति बनाए जाने की भी आवश्यकता है।