आयुर्वेद में है कॅरियर की अपार संभावनाएं

नेहा जैन
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


आयुर्वेद भारत की लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व की चिकित्सा पद्धति है। प्राचीन समय में लोग वैद्य से दवा लेते थे। धीरे-धीरे इन वैद्यों का स्थान डॉक्टरों ने ले लिया। एलोपैथी के आगमन से धीरे-धीरे आयुर्वेद का चलन कम होता चला गया। किन्तु समय के साथ ही एलोपैथी के नुकसान भी लोगों के सामने आने लगे। यह सही है कि एलोपैथी के माध्यम से क्षणभर में आराम मिलता है किन्तु यह बीमारी को ठीक करने में कारगर नहीं है। यह केवल उसे क्षण भर के लिए रोकती है। यह जीवन पद्धति की तरफ ध्यान नहीं देती। एलोपैथी से शरीर में अन्य बीमारियां भी जन्म लेती हैं और यह शरीर के ऑर्गन्स पर अपना दुष्प्रभाव छोड़ती है। एलोपैथी के जब से दुष्परिणाम लोगों के सामने आने लग गए हैं तब ऐसे में देश-विदेश में आयुर्वेद के प्रति लोगों का रूझान काफी अधिक बढ़ा है।
आयुर्वेद मनुष्य की जीवन पद्धति में सुधार कर जड़ी-बूटियों के माध्यम से रोगों के निदान की पद्धति है। यह वात, पित्त व कफ दोषों को ठीक कर मनुष्य को स्वस्थ बनाती है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक जड़ी बूटियों और खनिजों का उपयोग करके दवाओं को तैयार किया जाता है। जिस कारण इनका कोई साइड इफेक्ट नहीं है और यहां तक कि दुर्लभ बीमारियों के इलाज भी यह कारगर पाया जाता है। आयुर्वेदिक उपचार के जरिए रोगों से जड़ से छुटकारा पाया जा सकता है।
आयुर्वेद में हैं कई मौके

आज देश-विदेश हर जगह आयुर्वेद को अधिक ध्यान दिया जा रहा है। सरकार के आयुष्मान भारत में आयुर्वेद को भी प्रमुखता से जोड़ा गया है और भारत में प्रत्येक चिकित्सालय में एक आयुर्वेद का डॉक्टर भी अनिवार्य है। विभिन्न डिस्पेंसरियों व अस्पतालों में आयुर्वेद का अलग विभाग होता है जहाँ आयुर्वेदाचार्य यानी आयुर्वेदिक चिकित्सक की आवश्यकता होती है। साथ ही निजी प्रैक्टिस के माध्यम से भी स्वरोजगार प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा रिसर्च के क्षेत्र में आयुर्वेद में अपार संभावनाएं है। आज लाइलाज बीमारियों के अधिक होने से आयुर्वेद में इसके निदान तलाशे जा रहे हैं और इसके चलते देश-विदेश में रिसर्च हो रही हैं।

डॉ. महेश व्यास के अनुसार ”एक समय था जब विदेशों में आयुर्वेद स्थापित करने के लिए वहां की सरकारों से मिन्नतें करनी पड़ती थी, और एक आज का समय है जब विदेशी सरकारें भारत सरकार के साथ आयुर्वेद स्थापित करने के लिए एमओयू करने को बेकरार है। ”विदेशों में भी आयुर्वेद के क्षेत्र में चिकित्सा एवं रिसर्च में अपार संभावनाएं है।
चिकित्सा के अलावा भी आयुर्वेद को कॉस्मैटिक्स के तौर पर भी सराहा जाने लगा है। इस क्षेत्र में नए-नए प्रोडक्ट्स की खूब डिमांड है। वजन कम करने से लेकर खूबसूरती बढ़ाने के विभिन्न तरीकों के लिए भी आयुर्वेद की ओर लोगों का रूझान बढ़ा है। इसीलिए कई कम्पनियों के प्रोडक्ट्स मार्केट में उपलब्ध हैं और रोज नए प्रोडक्ट्स तैयार किए जा रहे हैं और मौजूदा प्रोडकट्स को बेहतर बनाने के लिए भी रिसर्च चल रही हैं। आयुर्वेद की पढ़ाई कर इसमें फैकल्टी के तौर पर भी आप करियर का चुनाव कर सकते हैं। आयुर्वेदिक फैकल्टी की डिमांड देश-विदेश हर जगह मौजूद है।

अब आयुर्वेद की इतने व्यापक स्तर पर मांग के चलते इस क्षेत्र में विशेषज्ञों की मांग होना भी लाजमी है। और भारत में आयुर्वेदिक डॉक्टरों की संख्या काफी कम है। ऐसे में आने वाले समय में आयुर्वेदिक चिकित्सकों की मांग बहुत अधिक बढऩे वाली है। अत: करियर का चुनाव करने वाले छात्र इस ओर भी ध्यान दे सकते हैं।

क्या है योग्यता?
आयुर्वेद में करियर बनाने के लिए बैचलर ऑफ आयुर्वेद मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएएमएस) डिग्री का होना जरूरी है। बीएएमसी में एडमिशन लेने के लिए बारहवीं में फिजिक्स, केमेस्ट्री एवं बायोलॉजी में 50 प्रतिशत अंकों के साथ पास होना अनिवार्य है। देश के कई कॉलेज एवं संस्थानों में आयुर्वेद की पढ़ाई होती है जिसमें प्रवेश परीक्षाओं के आधार पर एडमिशन मिलता है। आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए भी नीट यानी हृश्वश्वञ्ज की प्रवेश परीक्षा देनी होती है। उसके बाद विद्यार्थी को आयुर्वेद महाविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है। प्रत्येक महाविद्यालय में उस राज्य के छात्रों के लिए 85 प्रतिशत सीटें आरक्षित होती हैं, शेष 15 प्रतिशत सीटों पर पूरे देश के विद्यार्थी आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के बाद विद्यार्थियों की काउंसलिंग की जाती है और उसके बाद नीट में आए स्थान तथा काउंसलिंग के परिणामों के अनुसार उन्हें आयुर्वेदिक महाविद्यालय में प्रवेश मिलता है।
इस कोर्स को पूरा करने वाले स्टूडेंट्स को बीएएमसी की डिग्री दी जाती है। बीएएमसी की अवधि पांच या साढ़े पांच वर्ष की होती है। इसमें एक साल की इंटर्नशिप भी शमिल है।

आयुर्वेद में पीजी डिप्लोमा कोर्स
आयुर्वेद में 16 पीजी डिप्लोमा कोर्स होते हैं। पीजी डिप्लोमा के लिए योग्यता आयुर्वेद में बैचलर डिग्री का होना जरूरी है। पीजी डिप्लोमा की अवधि दो वर्ष की होती है। आयुर्वेद में डॉक्टर ऑफ मेडिसिन, एमडी पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कोर्स है। इसकी अवधि तीन साल की है।
आयुर्वेद की शिक्षा के लिए देश में कई संस्थान हैं जिनमें से कुछ प्रमुख यहां दिए जा रहे हैं।
1. चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान, दिल्ली
2. आयुर्वेदिक और यूनानी तिब्बिया महाविद्यालय एवं अस्पताल, दिल्ली
3. श्री धन्वतरी आयुर्वेदिक कॉलेज, चंडीगढ़
4. राजीव गांधी युनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साईंस, बेंगलुरु
5. गुजरात आयुर्वेद युनिवर्सिटी ,जामनगर गुजरात
6. बी रॉय स्टेट मेडिकल कॉलेज, कोलकाता
7. स्टेट आयुर्वेदिक कॉलेज लखनउ, उत्तरप्रदेश
8. श्री आयुर्वेदिक महाविद्यालय, नागपुर
9. ऋषिकुल स्टेट कॉलेज, हरिद्वार
10. दयानंद आयुर्वेदिक कॉलेज, जालंधर
11. आष्टांग आयुर्वेदिक कॉलेज, इंदौर
12. इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस बी एच यू वाराणसी
13. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद जयपुर
14. गुजरात आयुर्वेद यूनिवर्सिटी जामनगर

एजुकेशन लोन
आयुर्वेद की पढ़ाई करने के लिए सरकारी संस्थानों में फीस बहुत ही कम है किन्तु निजी संस्थानों में अधिक है। आप इसकी शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रमुख राष्ट्रीयकृत, प्राइवेट अथवा विदेशी बैंकों द्वारा एजुकेशन लोन प्राप्त कर सकते हैं। छात्र को जिस संस्थान में एडमिशन कराना होता है, वहां से जारी एडमिशन लेटर, हॉस्टल खर्च, ट्यूशन फीस एवं अन्य खर्चो का ब्योरा बैंक को देना होता है। अंतिम निर्णय बैंक को करना होता है।
विदेशों की रिसर्च का अनुसरण करने के चक्कर में हम अपने देश की अमूल्य चीजों को पीछे छोड़ते चले गए। किन्तु आज समय है भारत की उन तमाम चीजों को फिर से अपनाने का और दुनिया में भारत को ऐसा देश बनाने का जिसका अनुसरण विदेशी करें। आज भारत को विश्वगुरू बनाने का समय आ गया है और चिकित्सा एक ऐसा क्षेत्र है जिसके माध्यम से हम यह सपना जल्द पूरा कर सकते हैं।