आज भी उपयोगी है महाभारत की युद्ध कला

आनंद कुमार
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


भारतीय युद्ध कला को समझना हो तो हमें महाभारत पढऩी चाहिए। महाभारत के युद्ध में तीसरे दिन कौरवों की सेना गरुड़ व्यूह में सजती है। भीष्म इसके सबसे आगे के हिस्से में होते हैं और सबसे पीछे होता है दुर्योधन। इस तरह सेनानायक को सबसे पहले और बिलकुल खुलकर हमला करने का मौका मिलता है, लेकिन राजा सबसे पीछे होने के कारण सबसे सुरक्षित होता। इसका जवाब देने के लिए पांडवों की सेना अर्धचन्द्र व्यूह में सजती है। अर्धचन्द्र के दाहिने कोने पर अर्जुन थे और वाम कोण पर भीम, राजा युधिष्ठिर बीच में कहीं थे। अगर इस अर्धचन्द्र मंो युधिष्ठिर पर हमला करने के लिए कौरव सीधा आगे बढ़ते तो उनकी सेना का सबसे पीछे का (दुर्योधन वाला) हिस्सा अर्जुन और भीम के लिए खुला छूट जाता।
अर्धचन्द्र व्यूह बड़ी सेना के सीधा आक्रमण कर पाने की क्षमता को ख़त्म कर देता है। बड़ी सेना से छोटी सेना का मुकाबला हो तो छोटी सेना वालों के लिए अर्धचन्द्र अक्सर फायदेमंद होगा। महाभारत के तीसरे दिन भी यही हुआ था। सीधा आगे बढ़कर अर्धचन्द्र में फंसने के बदले कौरव सेना ने अर्जुन की ओर आक्रमण किया। अर्जुन स्वयं कुशल तो था ही, उसके साथ अभिमन्यु और सत्यकी जैसे योद्धा भी थे। वो तो भीष्म को रोकने में कामयाब हुआ, लेकिन उसकी तरफ सेना के मुड़ते ही सेना का पिछला हिस्सा अर्धचन्द्र के दूसरे सिरे की जद में आ गया। वहां मौजूद भीम और घटोत्कच ने दुर्योधन पर हमला कर दिया।
बेहोश होने पर जैसे ही दुर्योधन को युद्धक्षेत्र से हटाया गया, कौरव सेना में अफरातफरी मच गयी और भीष्म जैसे तैसे सेना को संभाल पाए थे। मासूम अहिंसक हिन्दू तो बेचारे ऐसी व्यूह रचना जैसी मार-काट भरी चीज़ें पढ़ते नहीं, लेकिन युद्धों के बारे में पढऩे-सीखने वाले इस अर्धचन्द्र व्यूह का काफी ध्यान से अध्ययन करते हैं। ईसा से करीब 216 साल पहले हन्निबाल ने जब रोम पर आक्रमण किया तो इसी अर्धचन्द्र व्यूह का इस्तेमाल किया था। हन्निबाल के पास भी सेना रोम के मुकाबले कम थी। उसने खुद पैदल सेना के ठीक बीचो बीच खड़े होकर लडऩे का फैसला किया और अपने घुड़सवारों को सेना के दाहिने और बायीं और सजाया।
रोमन सेना को लगा कि संख्या में कम हन्निबाल कि सेना को पीछे धकेलते हुए वो धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। असल में वो हन्निबाल के किराये के अप्रशिक्षित सैनिकों के घेरे में आते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद जब हन्निबाल के घुड़सवार भी टूट पड़े तो रोमन सेना के पास कहीं निकल भागने की जगह नहीं थी। वो गोल घेरे में चारों ओर से हन्निबाल का हमला झेलते कैन्नी के मैदान में हारकर ख़त्म हुए। आधुनिक युद्धों या कहिये थर्ड जनरेशन वॉर तक इस अर्धचन्द्र व्यूह को पिंसर मूवमेंट के नाम से जाना जाने लगा था और इसके सफलतापूर्वक इस्तेमाल के करीब दो दर्जन उदाहरण हर सैन्य कमांडर पढ़ता ही है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि महाभारत में दिए गए युद्ध व्यूह की उपयोगिता आज भी उतनी ही है, जितनी महाभारत के काल में थी। नाम भले ही बदल दिया गया हो, परंतु युद्ध कला वही है। परंतु हम महाभारत का पाठ कर जाएंगे, फिर भी उसमें दिए गए इन ज्ञान-विज्ञान को मिथक मान कर छोड़ देंगे।