आजानुबाहु राम

विपुल विजय रेगे


करोड़ों-अरबों में एक ही मनुष्य आजानुबाहु क्यों होता है। अभी अवतारों को लेकर कई बातें चली हैं। अवतारों के साधारण मनुष्य होने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इस बारे में डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल का लिखा बहुत मायने रखता है।
उन्होंने लिखा है कि ‘भारतीय वाङ्मय परम्परा में रामायण पहला काव्य प्रबन्ध है जिसके नायक मनुष्य हैं। वाल्मीकि का नायक पूर्णत: लौकिक मनुष्य है। कौशल्या के गर्भ से उत्पन्न, दशरथ का पुत्र राम जो शील, शक्ति और मर्यादा का प्रतिमान है, जो अपने स्वयं के पराक्रम के बल पर महान उपलब्धियां अर्जित करता है। राम के दिव्य-अलौकिक गुणों को देखकर सत्यदृष्टा ऋषियों ने यद्यपि इनमें ईश्वरीय अवतार के दर्शन किये हैं तथापि, अपनी दैहिक उपस्थिति में राम मानवी रुप ही हैं।
वे कहना चाहते हैं राम मानव रूप में अवतार थे। तथापि मानव रूप में होते हुए भी उनकी एक शारीरिक विशेषता ऐसी थी जो उन्हें आम मनुष्यों से अलग करती थी। ऐसी विशेषता जो उनके प्रचलित चित्रों में भी नहीं दिखाई देती। वाल्मीकि ने प्रभु राम के शरीर सौष्ठव के बारे में वणर्न करते हुए लिखा है ‘राम का वक्ष स्थल चौड़ा है। गले के नीचे की हड्डी मांस से ढंकी है। उनके कंधे बैल की तरह पुष्ट हैं।उनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी हैं। मस्तक बड़ा और ललाट चौड़ा है। उनकी चाल मनोहारी है।
शारीरिक दृष्टि से ‘आजानुबाहु’ या आजानुभुज’ होना उनके अवतार होने की पुष्टि करता है। आजानुबाहु यानि वह मनुष्य जिसकी भुजाए उसके घुटनों के भी नीचे तक पहुँचती हो। कदाचित संसार में ‘आजानुबाहु केवल श्रीराम ही हुए हैं। राम का आजानुबाहु होना उनकी धनुर्धर विद्या के लिए वरदान सिद्ध हुआ था। सामान्य मनुष्य की भुजाएं कमर और घुटनों के बीच तक रहती है, किन्तु राम की भुजाएं उनके घुटनों को स्पर्श करती हैं। यही कारण था जो राम को अप्रतिम धनुर्धर बनाता है।
डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ ने इस बारे में बहुत सुंदर व्याख्या की है। वे लिखते हैं ‘ राम का ‘शाङ्र्गÓ नाम का धनुष विश्वविख्यात था। इसीलिए वे शाङ्र्गधर या शाङ्र्गपाणि या सारंगपाणी के नाम से जाने जाते हैं। किसी भी धनुर्धर की श्रेष्ठता की कसौटी यह है कि वह कितने वेग से, कितनी दूरी तक और कितनी फुर्ती से धारा प्रवाह (एक के बाद एक) बाण छोड सकता है। जो धनुर्धारी जितनी चपलता के साथ ऐसा कर सकता है, वह युद्ध में उतना ही अपराजेय रहता है।
न्यूटन के गति, बल और त्वरण के प्रसिद्ध नियमों के पचड़े में न पडें तो भी यह आसानी से समझा जा सकता है कि धनुष का आकार जितना विशाल होगा उसकी प्रत्यंचा भी उतनी ही लम्बी होगी। चाप जितना वृहदाकार होगा उस पर चढाये गये बाण पर डोरी का तनाव बल भी उतना ही अधिक होगा। चाप पर तनी हुई प्रत्यंचा कमानी का कार्य करती है। इस प्रत्यंचा का तनाव बल ही बाण की गति और दूरी को निर्धारित करता है। सार यह है कि बाण की प्रहार क्षमता धनुष के आकार पर निर्भर होती हैं। अत: धनुष जितना विशाल होगा उसकी मारक क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी। इस दृष्टि से विशाल धनुष के संचालन के लिए शरीर की आकृति भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। अर्थात् भुजाएं जितनी अधिक लम्बी होगी उतने ही बडे धनुष पर शर-संधान किया जा सकता है। वाल्मीकि के नायक राम आजानुबाहु हैं। अपने समय के सर्वाधिक लम्बी भुजाओं वाले व्यक्ति।’
दु:ख की बात ये कि उनके विशिष्ट शारीरिक गुण को चित्रों में नहीं दिखाया जाता। उनका कोई भी प्रचलित चित्र उठाकर देख लीजिये, आपको ये विशेषता नहीं दिखाई देगी। मेरे एक मित्र ने विदेश से ईमेल कर ये जानना चाहा कि भारत में राम को ‘आजानुबाहु’ बोलने का चलन क्यों नहीं है। विदेशी मित्र इस बात से भी नाराज थे कि हिन्दुओं ने अपने आराध्य की इस विशेषता को सम्मान ही नहीं दिया है।
ये जानकारी उनके लिए जो चाहते हैं कि उनका अवतार स्वर्ण रथ में ही ऊपर से उतरे। अवतार मानव रूप में जन्मेगा तो क्या अवतार नहीं रहेगा। ये जानकारी देव पुरुषों और देवियों को आम मनुष्य बताने वाले मित्रों के लिए भी है कि अवतार दैहिक रूप में जन्म ले किन्तु कोई न कोई शारीरिक विशेषता लेकर जन्मता है। ऐसी विशेषता जो संसार के किसी और मनुष्य में नहीं होती। ईश्वरीय अंश को चुनौती देने से पहले थोड़ा जागरूक बने और सोचे कि करोड़ों-अरबों में एक ही मनुष्य आजानुबाहु क्यों होता है। राम के सिवा और कोई ये विशेषता लेकर नहीं जन्मा। यदि आपकी जानकारी में हो तो अवश्य साझा करें।