अर्थव्यवस्था में राष्ट्र की संस्कृति का प्रतिबिम्ब हो

अर्थव्यवस्था में राष्ट्र की संस्कृति का प्रतिबिम्ब हो

जवाहरलाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

शास्त्र के रूप में अर्थशास्त्र जैसा अमेरिका में पढ़ाया जाता है, उसी प्रकार हमारे देश में भी पढ़ाया जाता रहा है। उसके नियम, उसके सूत्र और उसकी धारणाएं सब वैश्विक हैं। सैद्धांतिक स्तर पर यह ठीक भी है, लेकिन व्यवहार में यह सही नहीं है। व्यवहार में उन नियमों, कायदों और सूत्रों को हूबहू लागू नहीं किया जा सकता है। यदि लागू करने का प्रयास किया भी जाए तो परिणाम अनुकूल नहीं मिलते। अमेरिका एक देश है जिसका क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल से कई गुना बड़ा है और वहाँ की जनसंख्या भारत का पांचवां भाग है। इसलिए सकल राष्ट्रीय सम्पति का बंटवारा किया जाए तो जन्म के समय ही एक अमेरिकी बच्चा उसी क्षण पैदा हुए भारतीय बच्चे से कई गुना सम्पतिवान होगा। दोनों देशों में आर्थिक प्रबंधन एक जैसा कैसे हो सकता है? दोनों की प्राथमिकताएं, दूरगामी लक्ष्य, तात्कालिक आवश्यकता, सभी तो भिन्न होंगी।
इसलिए हर देश की अर्थव्यवस्था अपनी वास्तवकिताओं और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के अनकूल ही ही बननी चाहिए, वही उस देश के लिए उपयोगी व्यवस्था होगी। जल, जंगल, जमीन के साथ ही हमारे पास विपुल जनसंसाधन भी है। इन सभी संसाधनों का सही उपयोग करते हुए इनकी सुरक्षा और सातत्य की उचित व्यवस्था करना ही हमारी सही अर्थव्यवस्था होगी। लेकिन क्या हमारी अर्थव्यस्था में इन बातों का ध्यान रखा गया है? क्या जल स्रोतों का उचित उपयोग करते हुए उसके स्रोतों के संरक्षण और उसकी निरंतरता की व्यवस्था हमारी अर्थनति का अनिवार्य अंग है? आज तो लगता है कि पानी के स्रोतों की रक्षा करना और औद्यौगिक विकास के बीच निरंतर टकराव की स्थिति सी पैदा हो गई है। दोनों में से एक का ही चुनाव करने की होड़ पैदा होती जा रही है।
जंगल तो अब केवल कागज पर ही सिमटते जा रहे हैं। भूमि पर से तो वे लगातार गायब होते जा रहे हैं। जमीन हो या जन संसाधन के मामलों में कहीं अति उपयोग हो रहा तो कहीं दुरुपयोग, लेकिन अधिकतर तो कोई उपयोग हो ही नहीं रहा है। हमारी अर्थव्यस्था दो धु्रवों के बीच झूलने लगी है जिसमें एक सिरे पर दुनिया के सम्पन्नतम लोग हैं तो दूसरे सिरे पर विपन्नतम लोग। बेरोजगारी, गरीबी, सूखा, बाढ़, पर्यावरण विनाश, जल स्रोतों का सूखना, आर्थिक विषमता की ये सभी समस्याएं इसी असंतुलन के कारण विकसित हो रही है। दु्रत गति से विकास भी इनको दूर नहीं कर सकता है। कारण यह है कि हमने अपने देश, अपने समाज को पहचान कर अपनी नीतियां बनाने का सिद्धांत दशकों पहले आजादी पाने की उम्मीद में ही छोड़ दिया था। और जब आजादी मिल गई तो हमारे पास देश चलाने के लिए कोई अपनी योजना नहीं थी। जो अंग्रेज अपने उपनिवेश पर शासन करने के लिए बना कर छोड़ कर चले गए थे उनमें से चुन चुन कर एक नीति बना दी। बीसवीं शताब्दी में कई देशों को अपनी अर्थनीतियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पड़ी। विश्वयुद्ध ने जापान को आर्थिक स्तर पर बुरी हालत में ला खड़ा किया था, परमाणु बमों की मार सह कर फिर से उठना बहुत साहस और जोखिम का काम था। लेकिन जापान के नेताओं के सामने कुछ ठोस तथ्य थे। जापान एक टापू देश है जो चारों ओर से समुद्र से घिरा है। क्षेत्रफल के अनुपात में आबादी बहुत है और क्षेत्रफल को बढ़ाने के सारे प्रयास विफल हो चके थे। ऐसे में कैसी अर्थव्यवस्था बनाई जाए? देश में धन का आयात करने का मार्ग उन्होंने खोज निकाला। जापान के पास उन्नत टेक्नोलोजी है। युद्ध के बावजूद जापानी की बौद्धिक क्षमता सुरक्षित थी। टेक्नोलोजी का अधिकतम उपयोग करके जापान को एक व्यापारिक देश बनाया जाए और कुछ वर्षों में वह बना भी। लेकिन जापान अमेरिका की तरह बाहर से आए कुछ समूहों द्वारा कृत्रिम रूप से बना कोई नया देश नहीं था जिसकी कोई संस्कृति ही नहीं रही हो। जापान की अपनी पुरानी संस्कृति थी, राष्ट्रीय संस्कार थे, मान्यताएं थीं। इसलिए उसने न तो अमेरिकी प्रबंधन को अपनाया और न ही ब्रिटिश व्यवस्था को। राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए उसनेे औद्योगिक निर्माण से लेकर आंतरिक प्रबंधन को अपनी ही आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर दिया। इजराइल की अपनी समस्या थी, वह एक अति प्राचीन जाति के सपने को आकार देने का प्रयास था। ईसापूर्व की एक जाति को ईसा की बीसवीं सदी में कैसे संगठित करना है, इसका अपना ही माडल इजराइल ने बनाया।
भारत की अर्थव्यवस्था अगर सही नहीं है तो कैसी होनी चाहिए? इसके लिए हमें भारत की उन विशेषताओं को पहचानना होगा जिनके कारण इस देश की राष्ट्रीय पहचान बनी है। हमारा देश विविधता का देश है क्योंकि प्रकृति ने इस देश को इसी रूप में रचा है। विविधता इसकी मौलिक पहचान है। सभी प्रकार की भौतिक विविधता है, चाहे जलवायु हो या भूसंरचना हो। यह नदियों, झीलों और तालाबों का देश है। हमारी प्राचीनतम स्मृतियां पानी से ही जुड़ी हैं। नदी हमारी लिए देवी के समान महत्त्वपूर्ण है। हम देवों का अभिषेक भी जल से ही करते हैं। लेकिन फिर भी यह देश किसी एक नदी या किसी एक सरोवर पर निर्भर देश नहीं। पानी भी हमारे यहां विविध रूपों में और विभिन्न मात्राओं में दिखता है। भूमध्यरेखा के निकट से लेकर हिमालय की चोटियों तक जलवायु भी अनेक रूपों में मिलता है। प्राकृतिक विविधता के मामले में भारत अतुलनीय है। जितनी प्रकार की वनस्पति हमारे देश में हैं उतनी विश्व के किसी भी देश में नहीं। स्वाभाविक है कि प्रकृति ने वैविध्य का जो आधार बनाया है, उसके अनरूप सामाजिक विविधता भी है। मौसम के अनुसार रीतियां और उत्सव ही नहीं आराधना और पूजा के भी अनेक रूप। जिनको पश्चिम में रिलिजियन कहते हैं वैसे तो हमारे देश में सैंकड़ों हैं। भाषाओं ने यहां जन्म लिया और संस्कृत जैसी कई भाषाओं में विश्व का अनंत ज्ञान भरा है, लेकिन आवश्यकता के अनुसार हमारी स्थानीय भाषाएं भी उतनी ही होंगी जितने पंथ और मार्ग हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि यहां वैचारिक विविधता भी आश्चर्यजनक है।
एक पाश्चात्य दार्शनिक ने इन बातों का अध्ययन करके लिखा कि यहां अनेक पंथ हैं, कई दार्शनिक धाराएं है,ं अनेक भाषाएं हैं। ऐसी अवस्था में पश्चिम में कई नए देश और राष्ट्र बन जाते, लेकिन यहां इन सबके बीच मूलभूत एकता रहती है। सभी एक विराट संस्कृति के अंग-उपांग ही हैं। वे दरअसल भारतीय धर्म की ही व्याख्या कर रहे थे। इसलिए जब हम किसी अर्थ व्यवस्था की बात करें तो वह एकांगी कैसे हो सकती है? उसे इस देश की भौतिक और सामाजिक विविधता की आवश्यकताओं की आपूर्ति के बावजूद सर्वांगीण विकास का ढांचा बनाना होगा।
गांधीजी भारत को गांवों का देश मानते थे और उनका विश्वास था कि गांवों का विकास तभी होगा जब गांवों की स्वायत्तता को सुरक्षित रखा जाए। गांव जीवंत आर्थिक इकाई तभी बनेगा जब वह सक्रिय सामाजिक इकाई भी हो। इसे ही वे ग्राम स्वराज कहते थे। जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था पश्चिम में विकसित हुई, वह एक छोटे से टापूवासियों की कल्पना थी जो अपने टापू की सीमाओं को लांघ कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। इसके केंद्र मे वह टापू था जिसके लोगों ने विश्व पर राज करने की कामना की थी। यह अर्थव्यवस्था मूलत: दूसरों के दमन की व्यवस्था ही होगी। इसमें शासक और शासित का अंतर तो बना ही रहेगा। इस औपनिवेषिक व्यवस्था के उलट अमेरिका में प्रकृति की गोद में पल रही अनेक जनजातियों को दबा कर अपना राज स्थापित करने का अनुबंध मात्र था जो आक्रामक जातियों के बीच ही हुआ था। स्थानीय जातियां तो उससे बाहर ही थीं। भारतीय सोच में अर्थ के बिना कोई काम नहीं हो सकता है, धर्म में भी अर्थ की आवश्यकता होती है। लेकिन अर्थ की कोई सीमा भी होनी चाहिए कि नहीं?
आधुनिक विश्व की दो प्रमुख विचारधाराओं में अर्थ चिंतन का प्रमुख विषय है लेकिन दोनों में अर्थ को एक दूसरे के विपरीत सिरे से आंका गया है। साम्यवादी व्यवस्था में समाज को वर्गों में बांटा गया है और इनमें समता लाने के लिए सर्वहारा की सत्ता स्थापित करने की व्यवस्था बनाई गई हैं। यह विचार विमर्श या सहमति से संभव नहीं, इसलिए इसे बलात् ही लाना होगा। जो सत्ता बलात् लाई जाएगी, वह बलात् ही चलेगी और बलात् ही हटेगी भी। उस व्यवस्था में समाज में किसी व्यापक समन्वय या सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता। दूसरे सिरे पर पूंजीवाद है जिसमें मानते हैें पूंजी को खुली छूट दी जानी चाहिए। यानी अर्थ को अर्जित करने पर कोई पाबंदी नहीं रहनी चाहिए। स्वतंत्र बाजार की कल्पना की गई है। यहां स्वतंत्र से मतलब बंधनहीन बाजार होता है। किसी के अर्थ कमाने की कोई सीमा नही होनी चाहिए। हालांकि अमेरिका के पास कोई प्राचीन संस्कार नहीं थे, फिर भी ईसाइयत स्वच्छंद व्यापार के मार्ग में आड़े आती थी। तब एक पादरी के बेटे ब्रूस बर्टन ने एक किताब लिखी ‘यंगमैन्स जीससÓ जिसमें उसने दिखाया कि जीसस किफायत करने की बात नहीं कहते थे, वे तो खुल कर खर्च करने को कहते थे। वे आज होते तो सबसे उम्दा कपड़ेे पहनते, सबसे उम्दा जीवन शैली के लिए प्रसिद्ध होते आदि आदि। यानी जो रही सही संस्कृति थी भी, उसे किनारे कर दिया गया। ऐसी व्यवस्था तभी संभव है जबकि अधिकतर लोग गरीब रहें। इसे ही वैश्वीकरण का नाम दे कर विश्वव्यापी बनाने का मतलब होता है कि यह अमेरिका की अमीरी तभी तक संभव होगी जब तक उसका माल खरीदने वाले देश उसके बराबर नहीं आ पाएं। इस व्यवस्था में भी एक वर्ग विशेष के हितों को ही ध्यान में रखा गया है। हम इसे वसुधैव कुटुम्बकम के अपने सिद्धांत के विरुद्ध मानते हैं। पश्चिम की विकास की प्रतिस्पर्धा में शामिल होना केवल गरीब देशों के दोहन करने वालो की पंक्ति में शामिल होने की ही प्रतियोगिता है।
हमारे देश की एक विशेषता बहुसंख्या है। भारत में पहले से ही लोग बड़ी संख्या में रहते रहे हैं। वर्ष 1947 में भी हमारी जनसंख्या अनेक देशों से अधिक थी और यही हाल मुगलों के शासनकाल में भी था और उससे पहले मौर्यों के काल में भी। प्रकृति ने इस भूमि को मानव निवास के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बनाया है। इसलिए हमारी किसी भी अर्थनीति का पहला उद्देश्य नागरिकों को काम देना है। स्वाभाविक है कि केवल औद्योगिक केंद्रीयकरण से यह संभव नहीं होगा। केंद्रीयकृत मशीनीकरण से काम घटेंगे, बढेंग़े नही। जब दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद पर विचार करना आरम्भ किया तो उन्होंने लिखा कि हर राष्ट्रीय विकास योजना का प्रथम उद्देश्य रोजगार के अधिकतम अवसर बनाना है। वे योजना का उद्देश्य ही ‘सबके लिए कामÓ के सिद्धांत को मानते थे। लेकिन यदि हम योजना का उद्देश्य अधिकतम धन कमाना रखें तो धन कमाने की लालसा भ्रष्टाचार और चोरी की प्रवृत्ति जगाती है। अगर हम सफलता को धन की मात्रा से मापना आरम्भ करें तो फिर गरीब के विकास के प्रति कोई ईमानदार नहीं रहेगा। इस तरह की प्रवृत्ति इसी सिद्धांत को प्रचलित करेगी कि जो सबसे बलवान हो, वही जीवित रहेगा यानी उसको ही जीने का अधिकार है। पश्चिमी व्यवस्था में मुक्त प्रतिस्पर्धा से ग्राहक को चुनाव करने की स्वतंत्रता रहती है। लेकिन चुनने की यह आजादी उसी समय समाप्त होती है जब प्रतिस्पर्धा में सबसे कुशल या शक्तिशाली जीत जाता है, प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है। इसे हम एकाधिकार कहते हैं। यही प्रवृत्ति जब राजनीति के मामले में आ जाती है तो अधिनायकतावाद कहते हैं। इस प्रकार के मुक्त बाजार में कीमतों को उपभोक्ता नहीं उत्पादक तय करता है। आर्थिक नीतियां ही यह तय करती हैं कि सरकार कैसी हो। अगर नीतियों में समाज को ऐसे वर्गों में बांटा जाता है जिनमें केवल एक ही सत्ता पाने का हकदार हो, वैसा समाजवाद हमारे लिए अनुकूल नही है। समाज को अलग अलग पं्रकार के उपभोक्ता वर्गों में बांट कर उसका अपने मुनाफे के अनुसार साधारणीकरण किया जाता है तो व्यक्ति के निजी गुणों और व्यक्तिगत प्रतिभा या सांस्कृतिक विशेषता का कोई स्थान नहीं रहता। ऐसी प्रणाली लोकतांत्रिक नही हो सकती और उससे पैदा हुई सरकारें देर सवेर अधिनायकवादी प्रवृत्ति का शिकार हो ही जाती हैं। भारत जैसे देश के लिए अर्थनीति वही होगी जो इस की विभिन्न विशेषताओं के बीच समन्वय पैदा करे और किसी एक तत्त्व को दूसरो पर हावी न होने दे। हम स्वभाव से समन्वयवादी हैं जो विविधता के बीच एकता स्थापित करते हैं, विविधता को दबा कर नहीं।