अधिक उपयोगी है गणित की भारतीय विधा

डॉ. चंद्रकांत राजू
लेखक प्रसिद्ध गणितज्ञ हैं।


भारत में हमने गणित की जो संकल्पना विकसित की थी, वह अत्यधिक सरल, उपयोगी और व्यवहारिक थी। दुर्भाग्यवश वर्तमान में यूरोप से आयातित होने के कारण वही गणित अत्यंत दुरूह, अनुपयोगी और अव्यवहारिक बन गया है। यही कारण है कि भारतवर्ष के बच्चे अधिकांशत: गणित को कठिन मानते हैं और उससे जी चुराते हैं। हमने गणित की अधिकांश विधाओं को केवल सबसे पहले नहीं किया, बल्कि अलग विधि से किया था। त्रिकोणमिति और ज्यामिति से लेकर कैल्कुलस तक हमने अलग विधि से किया। यदि हम इस असलियत को जान और स्वीकार लें तो प्रश्न उठता है कि कौन सी विधि श्रेष्ठ है? यदि हमारी विधि श्रेष्ठ और उपयोगी है तो उस पर गर्व करना बनता है और बात केवल गर्व करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि यह विधि श्रेष्ठ और उपयोगी साबित होती है तो इसे अपनाया भी जाना चाहिए।
हम इतिहास में नहीं जी सकते। इसलिए केवल यह कहना भर पर्याप्त नहीं है कि पाइथागोरस से पहले भी वह प्रमेय हमारे शुल्ब सूत्रों में था। हमें यह भी जानना होगा कि हमारे इस कथन पर पाश्चात्य गणितज्ञों ने प्रश्न खड़े किये हैं। उनका कहना है कि प्रमेय तो था, परंतु उसका प्रमाण नहीं था। प्रमाण पाइथागोरस ने दिया और इसलिए शुल्ब सूत्रों को इस प्रमेय का श्रेय नहीं दिया जा सकता। उनके इस आरोप का उत्तर भारत के किसी गणितज्ञ ने नहीं दिया, राजनेताओं की तो बात ही अलग है। परंतु शुल्ब सूत्रों में वर्णित प्रमेय का प्रमाण भी उपलब्ध है। समस्या केवल एक है कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण है जिसे आधुनिक गणित में नकार दिया जाता है। आधुनिक गणित केवल डिडक्शन पद्धति को ही स्वीकार करता है, प्रत्यक्ष प्रमाण यानी इम्पीरिकल प्रूफ को नहीं। यह वास्तव में गणित के दर्शन की बात है। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
बेहतर अंकगणित
पहली बात तो यह कि बात सिर्फ रोमन या अरबी अंकों की नहीं है। बात एक दक्ष अंकगणित की है जो व्यापार और वाणिज्य के लिए बहुत उपयोगी था। यूरोपीय ग्रीक और रोमन अंकगणित की प्रणाली अबेकस से जुडी थी, जो कि अंकगणित करने का बहुत रद्दी तरीका था। इसलिए फ्लोरेंस के व्यापारियों ने बारहवीं शताब्दीसे अबेकस छोड़ अल्गोरिथम अपनाना चालू किया। अल्गोरिथम शब्द अल्गोरिथ्मस से आया है जो बग़दाद के अल ख्वारिज्मी का लातिनी नाम था। याद रहे कि नवीं शताब्दी में अल ख्वारिज्मी ने हिसाब अल हिन्द नाम की किताब लिखी। इसी किताब को अफ्रीका से सीख कर उसका लातिनी अनुवाद फ्लोरेंस के फिबोनाच्ची ने बारहवीं सदी में लिबेर अबेकी के नाम से किया, जिससे यूरोप में हिन्दुस्तानी विधि का अंकगणित फैला।
यह वही अंकगणित है जो आज भी हम प्राइमरी स्कूल में सिखाते हैं। लेकिन दूसरी अचम्भे की बात यह है कि पश्चिम में इसे समझने में लगभग 500 साल से ज्यादा लगा दिए। यूरोप के बड़े से बड़े विद्वानों ने हिंदुस्तानी अंक गणित की विधि समझने में गलतियां कीं। जैसे कि गर्बर्ट जो कि दसवीं सदी में यूरोप का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता था और आगे चलकर पोप सिल्वेस्टर 2 बना। उसी ने सबसे पहले 976 इस्वी में कुर्तबा (ष्टशह्म्स्रशड्ढड्ड) से हिंदुस्तानी अंकगणित विधि अरबी अंको के नाम से आयातित की। गर्बर्ट ने अबेकस पर एक किताब लिखी। उसने मूर्खतापूर्वक यह सोचा कि अंकगणित केवल अबेकस की विधि से किया जा सकता है। इसलिए उसने अरबी अंको का एक अबेकस बना दिया, जैसे कि अंकों के आकार में ही कुछ जादू है!
फ्लोरेंस के व्यापारियों को भी हिंदुस्तानी अंक गणित समझने में मुश्किल हुई। यह बात जीरो नाम से ही स्पष्ट है। यह नाम जिफ्र या अरबी सिफ्र (ष्द्बश्चद्धद्गह्म्) शब्द से निकला है, जिसका अर्थ रहस्यमय कोड है। यह यूरोपियों को रहस्यमय इसलिए लगा क्योंकि रोमन अंक सिक्कों के समान हैं। ङ्गढ्ढढ्ढ का अर्थ होता है 10 + 1 + 1। दशमलव प्रणाली में 12 का अर्थ 1+2 = 3 नहीं होता लेकिन कई यूरोपियों को लगा कि जीरो का कोई मान नहीं है, इसलिए 10 और 1 एक बराबर हैं। लेन-देन में चकमा देने का यह सरल तरीका बन गया। जैसे कि 125 के करार को आसानी से 12500 में बदला जा सकता था। इसलिए 13 वीं शताब्दी में फ्लोरेंस ने अरबी अंको के खिलाफ कानून बनाया कि कोई भी वित्तीय करार को अंकों और शब्दों, दोनों में लिखना जरूरी है। इस कानून का पालन हम आज भी चेक लिखने में करते हैं। तीसरी बात यह कि यूरोपियोंसहित दुनिया ने हिंदुस्तान से केवल अंकगणित ही नहीं बल्कि लगभग सारा स्कूली गणित अलजेब्रा, त्रिकोणमिति, कैलकुलस और सांख्यिकी भी सीखा।
अलजेब्रा नाम अल ख्वारिज्मी की किताब अल जब्र वाल मुकाबला से आता है जो कि ब्रह्मगुप्त के अव्यक्त गणित और उससे समीकरण (मुकाबला) हल करने की विधि का अरबी में अनुवाद है। ऋग्वेद के अक्ष सूक्त में और महाभारत में नल और दमयंती की कथा में सांख्यिकी के सिद्धांत को लेकर झाड़ में फल को गिनने का वर्णन है। इसी तरह त्रिकोणमितीय फलन साइन (ह्यद्बठ्ठद्ग) हिंदुस्तानी नाम जीवा का गलत अनुवाद है। यह अनुवाद टोलेडो मैं 12वीं शताब्दी में हुआ, जब अरबी किताबों का लैटिन में सामूहिक अनुवाद हुआ। अनुवाद दो चरणों में हुआ। पहले चरण में अनुवाद करने वाले मोज्हरब और यहूदी गणित नहीं जानते थे। अरबी में जीवा को जीबा लिखा जाता था। उस जमाने में नुक्ता प्रचलित नहीं थे तो सिर्फ व्यंजन ज और ब लिखे और अनुवाद करने वालों ने उससे (गलत) जेब शब्द निकाला। दूसरे चरण में लैटिन में अनुवाद करने वाले ने इसका अनुवाद ह्यद्बठ्ठह्वह्य किया जिससे साइन बना।
लिमिटविहीन था कैल्कुलस
यह तो सभी जानते हैं कि कैल्कुलस के सहारे ही भौतिकी के सभी सूत्र लिखे जाते हैं, परंतु कोई यह नहीं जानता कि कैल्कुलस वास्तव में काफी पहले आर्यभट ने भारत में किया था। वही कैल्कुलस जब 16वीं शताब्दी में केरल आए जेसुइट पादरियों के द्वारा यूरोप पहुँचा तो उन्हें समझ नहीं आया। वर्ष 1762 तक यह उलझा हुआ ही रहा। कैल्कुलस का पिता माना जाने वाला न्यूटन भी यह नहीं समझ पा रहा था कि अनंत श्रेढ़ी का योग कैसे निकाला जाए। इसलिए उसने इसमें काल के एकरैखिक होने की ईसाई अवधारणा को मिलाकर इसका समाधान निकालने का प्रयास किया। इसे ही हम आज स्र/स्रह्ल के रूप में पढ़ते हैं।
हिंदुस्तान में संगम ग्राम के माधव ने ज्या, कोज्या, इत्यादि के सटीक मान 10 दशमलव स्थान तक निकाले और हम इससे संतुष्ट थे, क्योंकि इससे अधिक सटीकता की कुछ व्यवहारिक उपयोगिता तब नहीं थी। इसी कारण से आर्यभट ने पाई (π) के सटीक मान को आसन्न कहा। लेकिन पश्चिमी अंधविश्वास के मुताबिक मैथमेटिक्स को एग्जैक्ट होना जरूरी है, और उसके लिए 10 दशमलव स्थान तो क्या अरब-खरब दशमलव स्थान की सटीकता भी काफी नहीं है। यूरोपियों को सारे के सारे अनंत दशमलव स्थान चाहिए थे जो कि वास्तव में संभव ही नहीं है। मैथमेटिक्स एग्जैक्ट है, इस अंधविश्वास के कारण यूरोपियों ने सोचा कि जो चीज एग्जैक्ट नहीं है, वह मैथमेटिक्स नहीं हो सकती। डेकार्ट ने अपनी ज्यामिति नाम की किताब में लिखा (पाई की अनंत श्रेढ़ी की तरफ इशारा करते हुए) कि सीधी रेखा (व्यास) और वक्र रेखा (परिधि) की तुलना करना मनुष्य के दिमाग से परे है। क्योंकि अनंत श्रेढ़ी का योग भौतिक रूप से निकालना असंभव है इसलिए यूरोपियों ने अनंत श्रेढ़ी का योग गैरभौतिक ( द्वद्गह्लड्डश्चद्ध4ह्यद्बष्ड्डद्य) या कल्पना-मात्र तरीके से निकाला। इसके लिए काल्पनिक या गैर वास्तविक वास्तविक संख्याओं (ह्म्द्गड्डद्य ठ्ठह्वद्वड्ढद्गह्म्ह्य) और सीमा (द्यद्बद्वद्बह्लह्य) की भी कल्पना की। उपनिवेशवादी शिक्षा ने फिर हमें यह बताया कि गणित करने यह गैरभौतिक तरीका श्रेष्ठ है। हमारे ही गणित को गैरभौतिक तरीके से बदलकर हमें लौटा दिया।
आर्यभट ने कैल्कुलस संख्यात्मक विधि से किया था और वह आज की लिमिट वाले कैल्कुलस से कहीं अधिक सरल और उपयोगी है। इस विधि से कैल्कुलस पढऩे से विद्यार्थी को कुछ भी रटना नहीं पड़ता और वह केवल दस दिनों में इसका विशेषज्ञ बन जाता है। फिर उसे बड़ी से बड़ी गणना करने में समस्या नहीं होती। इस विधि को देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में आज फिर से पढ़ाया जाना प्रारंभ हुआ है।
प्रत्यक्ष बनाम कल्पना
सारे हिंदुस्तानी दर्शन प्रत्यक्ष प्रमाण को पहला प्रमाण मानते हैं, लेकिन पश्चिम में गणित की विधि में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है और उसे अविश्वसनीय माना जाता है। भारतीय गणित भारतीय दर्शनों की भांति प्रत्यक्ष प्रमाण को भी स्वीकार करता है, बल्कि प्रत्यक्ष ही पहला प्रमाण माना जाता है और उसके आधार पर ही बाद के अनुमान आदि प्रमाण दिये जाते हैं। भारतीय दर्शनों की यह पद्धति हमारे गणित में लागू होती है। उदाहरण के लिए 1+1=2 है। यह बताने के लिए हम दो अंगुलियों या दो वस्तुओं को दिखा कर एक और एक का योग दो सिखाते हैं। परंतु यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। आधुनिक गणित के डिडक्शन पद्धति से इसे साबित करने में बट्र्रेंड रसेल ने 378 पृष्ठ का गणित किया। हम समझ सकते हैं कि केवल 1+1=2 साबित करने के लिए यदि 378 पृष्ठ लग रहे हैं तो यह कितना कठिन होगा।
इसीप्रकार आर्यभट ने कहा कि पृथिवी कदंब के फूल के समान गोल है। उसके अनुयायी बताते हैं कि दूर के झाड़ दिखाई नहीं देते और इस बात से पृथिवी के गोलाकार होने का पता चलता है। समुद्र में चलता जहाज क्षितिज में विलीन हो जाता है और क्षितिज गोलाकार है। यहाँ से क्षितिज की दूरी नापने से पृथिवी का व्यास निकाला जा सकता है और यह सभी भारतीय गणितज्ञों ने काफी सटीक तरीके से किया। इसे हम एक और बात से समझ सकते हैं। भारतीय गणित ‘माना किÓ जैसे सिद्धांतों से नहीं चलता। चूँकि यहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण स्वीकार्य हैं, इसलिए कुछ भी मानने या कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है। हम प्रत्यक्ष वस्तुओं को लेकर गणना कर सकते हैं। आधुनिक गणित में बच्चों को अदृश्य वस्तुओं के आधार पर गणना करनी होती है। जब बच्चे को कुछ दिखेगा ही नहीं, तो वह उसे समझेगा कैसे? इसकी बजाय यदि हम बच्चे को किसी प्रत्यक्ष वस्तु या जानवर को दिखा कर समझाएंगे तो वह उसे तुरंत समझ जाएगा। यह विधि हम प्राथमिक कक्षाओं में प्रयोग करते भी हैं। प्रश्न है कि यदि प्राथमिक कक्षाओं में आपको प्रत्यक्ष प्रमाण स्वीकार हैं तो फिर ऊँची कक्षाओं में माना कि जैसे काल्पनिक और अदृश्य वस्तु का सहारा क्यों लेना पड़ता है?
ज्योमेट्री बाक्स या सुतली
इसी प्रकार त्रिकोणमिति और ज्यामिति दोनों भारत में पहले विकसित हुए, यहीं से दुनिया में फैले। परंतु हमने कोणों की नहीं चापों की बात की थी। कोण तो अ_ारहवीं शताब्दी में पहली बार प्रचलन में आए। भारत में ज्यामिति पढ़ाने के लिए सुतली का प्रयोग हुआ। सुतली को ही शुल्ब भी कहते हैं। आज भी भारत में बढ़ई, राजमिस्त्री आदि कारीगर सुतली से ही नापने का सारा काम करते हैं। इसकी तुलना ज्योमेट्री बाक्स से करें।
ज्योमेट्री बाक्स जो कि ज्यामिति पढऩे वाले सभी बच्चे खरीदते ही हैं, के सभी सामानों का कोई भी प्रयोग नहीं करता। उसमें से केवल डी, जिसे चाँद भी कहते हैं, परकार और स्केल ही उपयोग में आते हैं। डिवाइडर और त्रिभुजों का कोई प्रयोग नहीं होता। इसपर भी सभी इस ज्योमेट्री बाक्स को खरीदते ही हैं। परकार से ज्योमेट्री सीखने वाला बच्चा कभी भी भूमि पर लम्ब नहीं डाल सकता। साथ ही वक्र रेखा को नापना और टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ वाले खेत का क्षेत्रफल निकालना इससे संभव नहीं है।
भारतीय परंपरागत गणित से यह आसानी से किया जा सकता है। इसलिए अब रोप ज्योमेट्री यानी रज्जू गणित की बात होने लगी है। प्रत्यक्ष रूप से कोई भी बच्चा एक सुतली लेकर रज्जू गणित की विधि से व्यास और परिधि को नाप कर, सीधी और वक्र रेखा की तुलना कर पाई का मान निकाल सकता है, इसके लिए लंबे चौड़े सूत्रों और डिडक्शन की कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अंकगणित, त्रिकोणमिति, बीजगणित, रेखागणित, कैल्कुलस, सांख्यिकी आदि गणित की सभी विधाओं का भारत में न केवल विकास हुआ था, बल्कि वह अधिक सरल, उपयोगी और व्यावहारिक था और आज भी है।